Sunday, 29 May 2016

हार्दिक धन्यवाद!

                                                               हार्दिक धन्यवाद

रोज की तरह आज भी सूर्य पूर्व से उगा था। रोज की ही तरह आज भी मैं उषाकाल में ही उठा था। अपना गाउन उतार कर एक तरफ भी रोज की ही तरह रखा था। मॉर्निंग वॉक के कपड़े अब मेरे शरीर पर थे। सब कुछ रोज की ही तरह था, लेकिन मन बड़ा अनमना-सा हो रहा था।
एक बार तो लगा जैसे दुबारा कम्बल ओढ़ कर सो जाऊं, लेकिन अगर एक बार क्रम टूटा तो फिर टूटता ही चला जायेगा, सो कमरे से बाहर निकल आया।  हाथ-मुंह धो कर अपनी कोठी से बाहर निकल आया, सामने वाले पार्क में घूमने जाने के लिए।

कोठी से बाहर निकला ही था कि सामने दीवार पर लगे पोस्टर से निगाह मिलते ही पैर एकदम ठिठक गए। पोस्टर पर एक जाना-पहचाना चेहरा चिपका हुआ था। सवेरे-सवेरे दिमाग पर जोर डालने का मन न हुआ, सोचा बाद में सोचेंगे कि यह चेहरा किसका है? फिर सोचा, कहीं ऐसे दिमाग में टेंशन रख कर मॉर्निंग वाक की जा सकती है? सो, पहले देख लिया जाये कि यह जाना-पहचाना चेहरा है किसका?

Wednesday, 2 September 2015

ये "स " का चक्कर क्या है ?

                                                          ये "स " का चक्कर क्या है ?

अभी हाल-फिलहाल सचिन तेंदुलकर ने वन-डे क्रिकेट में डबल सेंचुरी मारी थी। क्या यह एक इत्तिफ़ाक़ था ?
कुछ साल पहले राजनीति में जब एक-दूसरे पर कीचड़ उछाला जा रहा था, तब सोनिया जी के पैर उखाड़ने में लगे उनके विरोधी उनका कुछ भी न तब बिगाड़ सके थे और न अब बिगाड़ पा रहे हैं। क्या ये भी एक इत्तिफ़ाक़ है।

Sunday, 23 August 2015

भूख कैसी कैसी

                                                                    भूख कैसी कैसी                                                  

भूख ! भूख  योँ  तो कई तरह की होती है जैसे शारीरिक भूख, मानसिक भूख इत्यादि, लेकिन इन सबसे बड़ी भूख होती है पेट की भूख! यह भूख ऐसी होती है, जो इंसान को सच्चाई के रास्ते से हटा कर बड़े से बड़ा अपराध करने को मजबूर कर देती है. यह भूख हमारे इस दुनिया में कदम रखते ही शुरू हो जाती है और तब तक रहती है जब तक हम इस दुनिया से कूच नहीं कर जाते। इस भूख की सबसे मजेदार बात है कि यह समय-समय पर अपना रूप भी बदलती रहती है जैसे दुनिया में कदम रखते ही इस भूख को शांत करने के लिए माँ के दूध की आवश्यकता होती है तो बुढ़ापे में जब दांत नहीं होते तब दूध-दलिया रोटी की जगह ले लेते हैं क्योंकि तब भी मुँह में दांत नहीं होते।

Tuesday, 11 August 2015

जाएं तो जाएं कहाँ

                                                               जाएं तो जाएं कहाँ 

आज की दुनिया में चारों तरफ भागमभाग मची हुई है। जिसे देखो, वही पैसा कमाने के लिए रात - दिन एक किये हुए है। स्वयं तो पैसा कमा ही रहे हैं, साथ ही यह भी चाहते हैं कि उनकी पत्नी भी उनके परिवार के लिए पैसा कमाए। इसीलिए आज के ज्यादातर युवक कामकाजी लड़की को अपनी जीवन संगिनी बनाना पसंद करते हैं।

Friday, 31 July 2015

Rani Madan Amar

                                                                 Rani Madan Amar


अभी नहा धोकर नाश्ता करते हुए कुछ लिखने का मूड बना ही रहा था कि पत्नी की आवाज़ आई, "जल्दी से नाश्ता कर लो, फिर थोड़ा बाजार भी चलना है।"
" ये थोड़ा बाजार क्या होता है, कहाँ होता है, हमने ना तो सुना है ना ही देखा है," मैंने चुटकी लेनी चाही।
"ये कहाँ होता है, कैसा होता है, कब लगता है, कहाँ लगता है, ये जब मेरे साथ घर से बाहर निकलोगे तो सब पता चल जाएगा।" पत्नी की आवाज़ रसोई से आई।