रविवार, 29 मई 2016

हार्दिक धन्यवाद!

                                                               हार्दिक धन्यवाद

रोज की तरह आज भी सूर्य पूर्व से उगा था। रोज की ही तरह आज भी मैं उषाकाल में ही उठा था। अपना गाउन उतार कर एक तरफ भी रोज की ही तरह रखा था। मॉर्निंग वॉक के कपड़े अब मेरे शरीर पर थे। सब कुछ रोज की ही तरह था, लेकिन मन बड़ा अनमना-सा हो रहा था।
एक बार तो लगा जैसे दुबारा कम्बल ओढ़ कर सो जाऊं, लेकिन अगर एक बार क्रम टूटा तो फिर टूटता ही चला जायेगा, सो कमरे से बाहर निकल आया।  हाथ-मुंह धो कर अपनी कोठी से बाहर निकल आया, सामने वाले पार्क में घूमने जाने के लिए।

कोठी से बाहर निकला ही था कि सामने दीवार पर लगे पोस्टर से निगाह मिलते ही पैर एकदम ठिठक गए। पोस्टर पर एक जाना-पहचाना चेहरा चिपका हुआ था। सवेरे-सवेरे दिमाग पर जोर डालने का मन न हुआ, सोचा बाद में सोचेंगे कि यह चेहरा किसका है? फिर सोचा, कहीं ऐसे दिमाग में टेंशन रख कर मॉर्निंग वाक की जा सकती है? सो, पहले देख लिया जाये कि यह जाना-पहचाना चेहरा है किसका?