दोस्तो,
नमस्कार!
आज मैं एक ऐसी कहानी आपके सामने रखने जा रहा हूँ, जिसने सुरसा के मुँह की तरह खड़े एक यक्ष प्रश्न का उत्तर तो दे दिया, लेकिन इस उत्तर से आप कितना संतुष्ट हो पाओगे, कहना मुश्किल है| प्रश्न था हमारे समाज में वृद्धाश्रम की आवश्यकता क्यों पड़ी ?
मेरे एक दोस्त हैं, नाम कुछ भी रख लेते हैं, मसलन रविंदर| रविंदर जी का अच्छा-खासा भरा-पूरा परिवार है | अपनी जवानी के दिनों में अपने परिवार को और अच्छा रहन-सहन देने के लिए अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण दस-बारह साल विदेशों में भी मेहनत -मज़दूरी करके गुज़ारे | जो कमाते, घर भेज देते | अपने शहर में छोटे भाई ने पूरे परिवार को बहुत अच्छे ढंग से संभाल रखा था | भाभी की इतनी हिम्मत नहीं थी कि अपने देवर के विरुद्ध अपने मियां को कुछ भी कह पाती |
समय बीतता गया | देवर ने आने वाली रकम का एक बड़ा हिस्सा अपने खाते में डालना चालू कर दिया | भाभी कुछ कहती तो कह देता कि तुम्हें या तुम्हारे बच्चों को किस चीज़ की कमी है, जो तुम हिसाब मांग रही हो, खाना-कपड़ा -लत्ता सब कुछ तो मिल जाता है समय पर | धीरे-धीरे देवर ने अपनी चालें चल कर पूरे घर को अपने कब्ज़े में ले लिया और फिर एक दिन वो आया, जब उसने अपने भाई के ख़रीदे दो-ढ़ाई सौ गज़ के प्लाट को बेच शहर की दूर-दराज़ बस्ती में सौ गज़ का एक प्लाट अपने नाम से ले लिया और उस पर भाई के भेजे पैसों से अपने नाम का मकान भी खड़ा कर लिया |
भाई विदेश से लौटा | हवाई अड्डे से सामान लेकर सीधा अपने घर लौटा | अपना घर ? उस प्लाट पर तो किसी और का कब्ज़ा था और वहां कोई अपना भी नज़र नहीं आ रहा था ? ये क्या हुआ, कहाँ चले गए सब ? कहाँ ढूँढू?
टेलीफोन-मोबाइल वगैरह तो थे नहीं की पूछ लेता की कहाँ हो तुम ? खैर, पड़ोसी से पूछता हूँ| पड़ोसी से पूछने पर जो पता चला, उससे तो मानो रविंदर के पैरों के नीचे से ज़मीन ही खिसक गयी | पड़ोसी से ही भाई का नया पता मिला | नए पते पर पहुंचने पर सारी कहानी सामने आ गयी | बीवी ने रोते-रोते सारी बातें अपने पति को बता दीं | भाई ने छोटे भाई को ललकारा तो छोटे भाई ने कुछ भी जवाब देने की बजाय पुलिस को बुला लिया और अपने भाई पर ही इल्ज़ाम लगा दिया कि बड़ा भाई उसे उसके घर से धक्का मार कर निकाल रहा है | पुलिस बड़े भाई को पकड़ कर ले गयी और वार्निंग देकर छोड़ दिया |
जवानी के दस बरस, हाड़तोड़ मेहनत और उसका ये परिणाम | अंदर तक टूट कर रह गया रविंदर | अब वह क्या करेगा? शरीर में इतनी हिम्मत नहीं थी कि दुबारा जिंदगी को शुरू किया जाए, पर जिंदगी है शुरू तो करनी पड़ेगी? लेकिन कैसे? कहाँ से लाएगा वह अपने शरीर में इतनी ताक़त? बीड़ी पीते हुए बाग़ के एक बेंच पर लेटे-लेटे वो सोच रहा था ? जब तक जिंदगी शुरू होगी वह अपने बीवी-बच्चों को कहाँ रखेगा? न जाने कैसे-कैसे डरा कर कितने सितम ढाये होंगे मेरे बीवी-बच्चों पर ? दाने-दाने के लिए मोहताज़ बना दिया होगा मेरे बीवी-बच्चों को |सोचते-सोचते रविंदर अपने एक दोस्त के दरवाजे तक आ पहुंचा था | दोस्त को थोड़ा-बहुत तो पता था कि रविंदर के साथ क्या-क्या हुआ है, फिर भी वह उससे पूरी बात पूछना चाह रहा था | सारी बातें बताने के बाद रविंदर ने उससे केवल एक महीने के लिए बीवी-बच्चों के रहने के लिए जगह की प्रार्थना की | केवल एक महीने के लिए कह कर दोस्त ने उसे अपने बीवी-बच्चों को लाने के लिए कह दिया | रविंदर अपने बेटे-बेटी और अपनी पत्नी को लेकर अपने दोस्त के घर आ गया |
समय ने अपनी गति जारी रखी, जिंदगी अपनी पटरी पर लौटने लगी? लेकिन क्या वाकई? लग तो यही रहा था, पर वास्तविकता कुछ और ही थी | बड़ी बेटी ने घर में आय की बढ़ोतरी के लिए एक कार्यालय में नौकरी कर ली थी | वहीं पर उसकी नज़र उसके साथ काम करने वाले एक क्लर्क के साथ लड़ गयीं | फिर क्या था? घर की आय की बढ़ोतरी अब लिपिस्टिक-पाउडर पर खर्च होने लगी और वो दिन दूर नहीं रहा, जब वो उस क्लर्क की क्लर्की बन कर उसके घर चली गयी | अब घर पर रविंदर के अलावा उसकी पत्नी और बेटा रह गए थे | अब बेटे ने घर में आय की बढ़ोतरी के लिए हाथ-पांव मारने शुरू कर दिए थे | उसे भी एक कार्यालय में अच्छे पद पर नौकरी मिल गयी | आज रविंदर ने सोचा की उसकी जिंदगी का लक्ष्य अब पूरा हो गया है | लेकिन इंसान कुछ सोचता है और भगवान कुछ करता है! यहाँ भी कुछ ऐसा ही होने वाला था!!!!
बेटे की उम्र शादी की हो चली थी | मां-बाप दोनों ही हाथ-पाँव मार रहे थे कि कोई अच्छी-सी लड़की मिल जाए तो इसके भी हाथ पीले कर दें | दो साल गुज़र गए कि किसी रिश्तेदार ने एक रिश्ता बता दिया |बेटे के हाथ पीले कर दिए गए |
रविंदर आज बड़ा खुश था | उसे जिंदगी की सारी खुशियां जो मिल गयी थीं | बेटे की अच्छी नौकरी, अपना मकान, सुगढ़ बहू, और उसे क्या चाहिए? अब वह बैठ कर खायेगा और बेटा कमायेगा | उसने सारे अपने काम-धंधे बंद कर दिए थे | अब कोई उससे कहता भी था तो वह बस एक ही जवाब दिया करता था कि अब तो बेटा कमायेगा और मैं खाऊंगा | अरे, साठ साल में तो सरकार भी रिटायर कर देती है, मेरी किस्मत में क्या पूरी जिंदगी काम करना लिखा है , जिंदगी में कुछ आराम भी करूँ या नहीं?
और उसका यह सपना उस दिन टूट गया, जिस दिन बेटे ने जवाब दिया कि मैं इस महंगाई के समय में कितनों की देखभाल करूँ, दुनिया में रोज एक आदमी बूढ़ा होता है लेकिन वो लोग तुम्हारी तरह से काम छोड़ कर अपने बच्चों पर आश्रित नहीं हो जाते कि अब बच्चे खिलाएंगे और हम खाएंगे | पूरी जिंदगी में रविंदर जितना आज की रात रोया उतना तो शायद वह कभी रोया हो, उसे याद नहीं |
अगले दिन वह अपने उसी दोस्त के पास खड़ा था, जिसने उसे विदेश से आने के बाद अपने घर में जगह दी थी | आज रविंदर उसके घर में जगह नहीं, उससे सलाह लेने आया था | रविंदर से सारी बातें जानने के बाद उसके दोस्त का मानना था कि पढ़े-लिखे तुम हो नहीं और रही बात मेहनत -मजदूरी की, तो वो कोई इस उम्र में तुम्हे देगा नहीं| तो क्या किया जाए? दोस्त ने ये कह कर रविंदर को विदा किया कि वह सोच कर कोई जवाब देगा, तब तक बेटे की बातें सुनने के अलावा उसके पास कोई और चारा भी नहीं है|
अब तो बाप-बेटे में ठन गयी | बेटा अब कुछ भी भला-बुरा कहने से बाज़ नहीं आता श और रविंदर के पास आंसूं बहाने के अलावा और कोई काम नहीं था | इसी आंसूं बहाने से अब रविंदर की आँखों ने भी उसका साथ देना बंद कर दिया था |
आज उसका दोस्त उसे आँखों के डॉक्टर के पास ले गया था | डॉक्टर ने आँखों में मोतियबिंद बता दिया | बेटे से बात की तो उसने स्पष्ट शब्दों में कह दिया की मैं अपनी तनखा से आधी तनखा तुम पर नहीं लगा सकता, हो सके तो किसी खैराती हॉस्पिटल में इलाज करवा लो, लेंस के जो दो-चार हज़ार होंगे, वो मैं दे दूंगा | रविंदर मन ही मन सोच रहा था कि बेटे, आँखों के इलाज के लिए तो तूने इतना रुला दिया, लेकिन दांतों के इलाज के लिए कैसे कहूँ, जिसका दर्द मैं अब रोज ही सह रहा हूँ. |
आज वह अपने उसी दोस्त के सामने फिर खड़ा था, हाथ जोड़े हुए, लगता था जैसे वह अभी उसके क़दमों में गिर जायेगा | फिर क्या सोचा मेरे लिए के अंदाज में | दोस्त ने उसे समझाते हुए कि अब तो केवल एक ही रास्ता बचा है और वह यह कि जो हमारी सरकार वृद्धावस्था आर्थिक सहायता देती है, वह तुम्हे भी दिलवा दी जाए, जिससे कम से कम तुम अपनी भूख तो मिटा सकोगे | रविंदर ने रोते-रोते हामी भर दी |
अगले दिन रविंदर अपने दोस्त के साथ अपने इलाके के विधायक के पास बैठा था, अपने सारे प्रमाणपत्रों के साथ |विधायक साहेब अपने काम में मशगूल थे | अपने कामों से निपट कर रविंदर और उसके दोस्त की ओर मुखातिब हुए और आने का कारण पूछा | रविंदर के दोस्त ने उनकी और सारे डाक्यूमेंट्स बढ़ा दिए | डाक्यूमेंट्स देख कर विधायक साहेब का कहना था कि वे अगले साल आएं, तभी उनकी पेंशन चालू हो सकेगी | रविंदर का मुँह उतर गया, केवल पंद्रह सौ रूपए के लिए अगले साल तक इंतज़ार!!
रविंदर अपने दोस्त के साथ वापस आ गया | रास्ते में आते हुए सोच रहा था कि यदि उसकी जगह विधायक का अपना कोई होता तो क्या उसे भी वह अगले साल तक इंतज़ार करवाता ? क्या अगले साल तक वह इस दुनिया में रहेगा भी की नहीं ?
रात हुई ? बेटा काम से घर लौटा | रविंदर ने उसे अपने पास बिठाया और अपने आंसूं पोंछते हुए बोला कि शायद तुम ठीक ही कह रहे हो | आज की इस महंगाई के ज़माने में मुझ जैसे बूढ़े पर तुम्हारी आधी तनखा ख़त्म हो जायेगी तो तुम अपने परिवार का पेट कैसे पालोगे ? अच्छा हो कि कल सुबह ही तुम मुझे किसी वृद्धाश्रम में छोड़ आओ | मैं बाकी की जिंदगी वहीं गुज़ार लूँगा |
रविंदर का बेटा आकाश में शून्य को निहार रहा था | क्या ये सही रहेगा ?
कुछ महीनों बाद..
रविंदर के फ़ोन की घंटी बजी | वृद्धाश्रम से फ़ोन था, रविंदर के इस दुनिया से चले जाने का | बेटे ने फ़ोन ये कह कर काट दिया कि वह किसी रविंदर को नहीं जानता क्योंकि उसे लग रहा था कि अब रविंदर के अंतिम क्रियाकर्म का पैसा भी उसे ही देना पड़ेगा और वह ये पैसा किसी भी कीमत पर खर्च नहीं करना चाहता था |
(मेरी शीघ्र प्रकाशित पुस्तक टूटते रिश्ते से साभार )
नमस्कार!
आज मैं एक ऐसी कहानी आपके सामने रखने जा रहा हूँ, जिसने सुरसा के मुँह की तरह खड़े एक यक्ष प्रश्न का उत्तर तो दे दिया, लेकिन इस उत्तर से आप कितना संतुष्ट हो पाओगे, कहना मुश्किल है| प्रश्न था हमारे समाज में वृद्धाश्रम की आवश्यकता क्यों पड़ी ?
मेरे एक दोस्त हैं, नाम कुछ भी रख लेते हैं, मसलन रविंदर| रविंदर जी का अच्छा-खासा भरा-पूरा परिवार है | अपनी जवानी के दिनों में अपने परिवार को और अच्छा रहन-सहन देने के लिए अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण दस-बारह साल विदेशों में भी मेहनत -मज़दूरी करके गुज़ारे | जो कमाते, घर भेज देते | अपने शहर में छोटे भाई ने पूरे परिवार को बहुत अच्छे ढंग से संभाल रखा था | भाभी की इतनी हिम्मत नहीं थी कि अपने देवर के विरुद्ध अपने मियां को कुछ भी कह पाती |
समय बीतता गया | देवर ने आने वाली रकम का एक बड़ा हिस्सा अपने खाते में डालना चालू कर दिया | भाभी कुछ कहती तो कह देता कि तुम्हें या तुम्हारे बच्चों को किस चीज़ की कमी है, जो तुम हिसाब मांग रही हो, खाना-कपड़ा -लत्ता सब कुछ तो मिल जाता है समय पर | धीरे-धीरे देवर ने अपनी चालें चल कर पूरे घर को अपने कब्ज़े में ले लिया और फिर एक दिन वो आया, जब उसने अपने भाई के ख़रीदे दो-ढ़ाई सौ गज़ के प्लाट को बेच शहर की दूर-दराज़ बस्ती में सौ गज़ का एक प्लाट अपने नाम से ले लिया और उस पर भाई के भेजे पैसों से अपने नाम का मकान भी खड़ा कर लिया |
भाई विदेश से लौटा | हवाई अड्डे से सामान लेकर सीधा अपने घर लौटा | अपना घर ? उस प्लाट पर तो किसी और का कब्ज़ा था और वहां कोई अपना भी नज़र नहीं आ रहा था ? ये क्या हुआ, कहाँ चले गए सब ? कहाँ ढूँढू?
टेलीफोन-मोबाइल वगैरह तो थे नहीं की पूछ लेता की कहाँ हो तुम ? खैर, पड़ोसी से पूछता हूँ| पड़ोसी से पूछने पर जो पता चला, उससे तो मानो रविंदर के पैरों के नीचे से ज़मीन ही खिसक गयी | पड़ोसी से ही भाई का नया पता मिला | नए पते पर पहुंचने पर सारी कहानी सामने आ गयी | बीवी ने रोते-रोते सारी बातें अपने पति को बता दीं | भाई ने छोटे भाई को ललकारा तो छोटे भाई ने कुछ भी जवाब देने की बजाय पुलिस को बुला लिया और अपने भाई पर ही इल्ज़ाम लगा दिया कि बड़ा भाई उसे उसके घर से धक्का मार कर निकाल रहा है | पुलिस बड़े भाई को पकड़ कर ले गयी और वार्निंग देकर छोड़ दिया |
जवानी के दस बरस, हाड़तोड़ मेहनत और उसका ये परिणाम | अंदर तक टूट कर रह गया रविंदर | अब वह क्या करेगा? शरीर में इतनी हिम्मत नहीं थी कि दुबारा जिंदगी को शुरू किया जाए, पर जिंदगी है शुरू तो करनी पड़ेगी? लेकिन कैसे? कहाँ से लाएगा वह अपने शरीर में इतनी ताक़त? बीड़ी पीते हुए बाग़ के एक बेंच पर लेटे-लेटे वो सोच रहा था ? जब तक जिंदगी शुरू होगी वह अपने बीवी-बच्चों को कहाँ रखेगा? न जाने कैसे-कैसे डरा कर कितने सितम ढाये होंगे मेरे बीवी-बच्चों पर ? दाने-दाने के लिए मोहताज़ बना दिया होगा मेरे बीवी-बच्चों को |सोचते-सोचते रविंदर अपने एक दोस्त के दरवाजे तक आ पहुंचा था | दोस्त को थोड़ा-बहुत तो पता था कि रविंदर के साथ क्या-क्या हुआ है, फिर भी वह उससे पूरी बात पूछना चाह रहा था | सारी बातें बताने के बाद रविंदर ने उससे केवल एक महीने के लिए बीवी-बच्चों के रहने के लिए जगह की प्रार्थना की | केवल एक महीने के लिए कह कर दोस्त ने उसे अपने बीवी-बच्चों को लाने के लिए कह दिया | रविंदर अपने बेटे-बेटी और अपनी पत्नी को लेकर अपने दोस्त के घर आ गया |
समय ने अपनी गति जारी रखी, जिंदगी अपनी पटरी पर लौटने लगी? लेकिन क्या वाकई? लग तो यही रहा था, पर वास्तविकता कुछ और ही थी | बड़ी बेटी ने घर में आय की बढ़ोतरी के लिए एक कार्यालय में नौकरी कर ली थी | वहीं पर उसकी नज़र उसके साथ काम करने वाले एक क्लर्क के साथ लड़ गयीं | फिर क्या था? घर की आय की बढ़ोतरी अब लिपिस्टिक-पाउडर पर खर्च होने लगी और वो दिन दूर नहीं रहा, जब वो उस क्लर्क की क्लर्की बन कर उसके घर चली गयी | अब घर पर रविंदर के अलावा उसकी पत्नी और बेटा रह गए थे | अब बेटे ने घर में आय की बढ़ोतरी के लिए हाथ-पांव मारने शुरू कर दिए थे | उसे भी एक कार्यालय में अच्छे पद पर नौकरी मिल गयी | आज रविंदर ने सोचा की उसकी जिंदगी का लक्ष्य अब पूरा हो गया है | लेकिन इंसान कुछ सोचता है और भगवान कुछ करता है! यहाँ भी कुछ ऐसा ही होने वाला था!!!!
बेटे की उम्र शादी की हो चली थी | मां-बाप दोनों ही हाथ-पाँव मार रहे थे कि कोई अच्छी-सी लड़की मिल जाए तो इसके भी हाथ पीले कर दें | दो साल गुज़र गए कि किसी रिश्तेदार ने एक रिश्ता बता दिया |बेटे के हाथ पीले कर दिए गए |
रविंदर आज बड़ा खुश था | उसे जिंदगी की सारी खुशियां जो मिल गयी थीं | बेटे की अच्छी नौकरी, अपना मकान, सुगढ़ बहू, और उसे क्या चाहिए? अब वह बैठ कर खायेगा और बेटा कमायेगा | उसने सारे अपने काम-धंधे बंद कर दिए थे | अब कोई उससे कहता भी था तो वह बस एक ही जवाब दिया करता था कि अब तो बेटा कमायेगा और मैं खाऊंगा | अरे, साठ साल में तो सरकार भी रिटायर कर देती है, मेरी किस्मत में क्या पूरी जिंदगी काम करना लिखा है , जिंदगी में कुछ आराम भी करूँ या नहीं?
और उसका यह सपना उस दिन टूट गया, जिस दिन बेटे ने जवाब दिया कि मैं इस महंगाई के समय में कितनों की देखभाल करूँ, दुनिया में रोज एक आदमी बूढ़ा होता है लेकिन वो लोग तुम्हारी तरह से काम छोड़ कर अपने बच्चों पर आश्रित नहीं हो जाते कि अब बच्चे खिलाएंगे और हम खाएंगे | पूरी जिंदगी में रविंदर जितना आज की रात रोया उतना तो शायद वह कभी रोया हो, उसे याद नहीं |
अगले दिन वह अपने उसी दोस्त के पास खड़ा था, जिसने उसे विदेश से आने के बाद अपने घर में जगह दी थी | आज रविंदर उसके घर में जगह नहीं, उससे सलाह लेने आया था | रविंदर से सारी बातें जानने के बाद उसके दोस्त का मानना था कि पढ़े-लिखे तुम हो नहीं और रही बात मेहनत -मजदूरी की, तो वो कोई इस उम्र में तुम्हे देगा नहीं| तो क्या किया जाए? दोस्त ने ये कह कर रविंदर को विदा किया कि वह सोच कर कोई जवाब देगा, तब तक बेटे की बातें सुनने के अलावा उसके पास कोई और चारा भी नहीं है|
अब तो बाप-बेटे में ठन गयी | बेटा अब कुछ भी भला-बुरा कहने से बाज़ नहीं आता श और रविंदर के पास आंसूं बहाने के अलावा और कोई काम नहीं था | इसी आंसूं बहाने से अब रविंदर की आँखों ने भी उसका साथ देना बंद कर दिया था |
आज उसका दोस्त उसे आँखों के डॉक्टर के पास ले गया था | डॉक्टर ने आँखों में मोतियबिंद बता दिया | बेटे से बात की तो उसने स्पष्ट शब्दों में कह दिया की मैं अपनी तनखा से आधी तनखा तुम पर नहीं लगा सकता, हो सके तो किसी खैराती हॉस्पिटल में इलाज करवा लो, लेंस के जो दो-चार हज़ार होंगे, वो मैं दे दूंगा | रविंदर मन ही मन सोच रहा था कि बेटे, आँखों के इलाज के लिए तो तूने इतना रुला दिया, लेकिन दांतों के इलाज के लिए कैसे कहूँ, जिसका दर्द मैं अब रोज ही सह रहा हूँ. |
आज वह अपने उसी दोस्त के सामने फिर खड़ा था, हाथ जोड़े हुए, लगता था जैसे वह अभी उसके क़दमों में गिर जायेगा | फिर क्या सोचा मेरे लिए के अंदाज में | दोस्त ने उसे समझाते हुए कि अब तो केवल एक ही रास्ता बचा है और वह यह कि जो हमारी सरकार वृद्धावस्था आर्थिक सहायता देती है, वह तुम्हे भी दिलवा दी जाए, जिससे कम से कम तुम अपनी भूख तो मिटा सकोगे | रविंदर ने रोते-रोते हामी भर दी |
अगले दिन रविंदर अपने दोस्त के साथ अपने इलाके के विधायक के पास बैठा था, अपने सारे प्रमाणपत्रों के साथ |विधायक साहेब अपने काम में मशगूल थे | अपने कामों से निपट कर रविंदर और उसके दोस्त की ओर मुखातिब हुए और आने का कारण पूछा | रविंदर के दोस्त ने उनकी और सारे डाक्यूमेंट्स बढ़ा दिए | डाक्यूमेंट्स देख कर विधायक साहेब का कहना था कि वे अगले साल आएं, तभी उनकी पेंशन चालू हो सकेगी | रविंदर का मुँह उतर गया, केवल पंद्रह सौ रूपए के लिए अगले साल तक इंतज़ार!!
रविंदर अपने दोस्त के साथ वापस आ गया | रास्ते में आते हुए सोच रहा था कि यदि उसकी जगह विधायक का अपना कोई होता तो क्या उसे भी वह अगले साल तक इंतज़ार करवाता ? क्या अगले साल तक वह इस दुनिया में रहेगा भी की नहीं ?
रात हुई ? बेटा काम से घर लौटा | रविंदर ने उसे अपने पास बिठाया और अपने आंसूं पोंछते हुए बोला कि शायद तुम ठीक ही कह रहे हो | आज की इस महंगाई के ज़माने में मुझ जैसे बूढ़े पर तुम्हारी आधी तनखा ख़त्म हो जायेगी तो तुम अपने परिवार का पेट कैसे पालोगे ? अच्छा हो कि कल सुबह ही तुम मुझे किसी वृद्धाश्रम में छोड़ आओ | मैं बाकी की जिंदगी वहीं गुज़ार लूँगा |
रविंदर का बेटा आकाश में शून्य को निहार रहा था | क्या ये सही रहेगा ?
कुछ महीनों बाद..
रविंदर के फ़ोन की घंटी बजी | वृद्धाश्रम से फ़ोन था, रविंदर के इस दुनिया से चले जाने का | बेटे ने फ़ोन ये कह कर काट दिया कि वह किसी रविंदर को नहीं जानता क्योंकि उसे लग रहा था कि अब रविंदर के अंतिम क्रियाकर्म का पैसा भी उसे ही देना पड़ेगा और वह ये पैसा किसी भी कीमत पर खर्च नहीं करना चाहता था |
(मेरी शीघ्र प्रकाशित पुस्तक टूटते रिश्ते से साभार )
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