भगवान श्री सूर्य देव अपने सिंहासन की तरफ अपने परिवार के साथ बढ़ रहे थे। सिंहासन के समीप पहुँच कर यमुना जी अपने सिंहासन पर विराजमान होती हैं , साथ ही भगवान सूर्यदेव भी अपने सिंहासन पर व उनकी पत्नी छाया भी सिंहासन विराजमान होती हैं। तभी धर्मराज जी का आगमन है ! धर्मराज जी अपने माता पिता के चरणों में प्रणाम कर सिंहासन विराजमान हैं। तभी :
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यमुना जी : आदरणीय माता पिता जी के चरणों में सादर वंदना !
भगवान सूर्यदेव : चिरंजीवी भव !
यमुना जी : पिता जी , मैं अपने भाई से कई बार कह चुकी हूँ की समस्त ब्रह्माण्ड का लेखा -जोखा रखने के बाद अपनी बहन का भी लेखा - जोखा रख लिया करें !
धर्मराज जी : पिता जी अपनी बहन का लेखा - जोखा पूर्ण रूप से रखता हूँ। देखो न कितनी कमजोर हो गयी हैं! पृथ्वीवासियों ने अपने मैल से मेरी इस बहन को इतना गन्दा कर दिया है कि अब इसे दोबारा से स्वस्थ करने के लिए हर पहलू तरीका आजमा रहे हैं !
यमुना जी : भइया, ये तो विधि का विधान है ! जो स्वस्थ होता है, वही बीमार भी होता है ! अब धीरे-धीरे पृथ्वी पर भारी कलयुग जो आने वाला है ! तभी तो मेरी लाडली बहन गंगा भी तो धीरे - धीरे कमजोर होती जा रही है ! तो क्या, भइया आप इस इंतज़ार में हैं कि कब मैं चलने फिरने लायक भी ना रहूँ, तभी आप मेरे महल में अपना पदार्पण करें !
धर्मराज जी : नहीं बहन, ऐसा नहीं कहते। दरअसल, आज पृथ्वी पर जिस तरह से अत्याचार बढ़ रहे हैं। लूट - खसोट, हत्याएं आदि अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुके हैं,उसे देखते हुए विधाता ने जो कर्मों फल देने का काम मुझे दे रखा है, वह बहुत बढ़ गया है! केवल इसलिए मैं तुम्हारे महल में पदार्पण नहीं कर पा रहा हूँ। लेकिन जैसे ही मुझे समय मिलेगा मैं अपनी प्यारी बहन के महल में जरूर आऊंगा !
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