मंगलवार, 11 अगस्त 2015

जाएं तो जाएं कहाँ

                                                               जाएं तो जाएं कहाँ 

आज की दुनिया में चारों तरफ भागमभाग मची हुई है। जिसे देखो, वही पैसा कमाने के लिए रात - दिन एक किये हुए है। स्वयं तो पैसा कमा ही रहे हैं, साथ ही यह भी चाहते हैं कि उनकी पत्नी भी उनके परिवार के लिए पैसा कमाए। इसीलिए आज के ज्यादातर युवक कामकाजी लड़की को अपनी जीवन संगिनी बनाना पसंद करते हैं।

यदि इन युवकों से पूछा जाए कि ये जो रात-दिन एक करके पैसा कमा रहे हैं, किसके लिए तो शायद इनका जवाब होगा अपने लिए, अपने बच्चों के लिए, जो शायद इस सदी का सबसे बड़ा झूठ होगा।
क्योंकि युवा पीढ़ी जो ये कहती है कि वे अपने बच्चों के लिए पैसा कमा रहे हैं, से पूछें कि पैसा जो वे अपने बच्चों के लिए कमा रहे हैं, वे उससे अपने बच्चों को क्या वे चीज़ दिला पायेंगे, जिसकी कि उनका बच्चा तमन्ना करता है तो भी शायद वे ये ही जवाब देंगे: "क्यों नहीं, पैसा है तो दुनिया की हर चीज़ खरीदी जा सकती है।" परन्तु शायद उन्हें ये नहीं पता कि दुनिया की हर चीज़ तो पैसे से खरीदी जा सकती है, नहीं ख़रीदा जा सकता तो माँ-बाप का प्यार, जो आज की दुनिया में खत्म होता जा रहा है।
जिस प्रकार कोई भी मकान बिना नींव के खड़ा नहीं हो सकता, उसी प्रकार किसी भी बच्चे का भविष्य अपने माँ-बाप के प्यार के बिना नहीं संवर सकता। एक मोटे तौर पर अनुमान लगाया जाए तो हफ्ते के सात दिनों में से एक दिन भी हम अपने बच्चे को प्यार नहीं कर पाते। सवेरे जब बच्चा स्कूल जा रहा होता है तो बाप अपने दैनिक कार्यों में लगा होता है और माँ जल्दबाज़ी में अपने बच्चे के लिए या तो नाश्ता तैयार करने में लगी होती है या बच्चे को तैयार करने में लगी होती है। बच्चा तो दोपहर को ही घर लौट आता है, जबकि माँ-बाप का ऑफिस लौटने का समय शाम पांच-छह बजे का होता है। बच्चा आपसे कुछ पूछना चाहता है, आप उसे अपनी थकान का बहाना बना कर उसकी माँ के पास भेज देते हैं। माँ शाम का खाना बनाने की तैयारी में जुटी है। ऐसे में बच्चा जाये तो किसके पास जाये? और फिर रात होते ही सोने की तैयारी। बच्चा सोचता ही रह जाता है कि वह जाये तो किसके पास ?
बच्चे का मन कोमल फूल के समान होता है। वंश वृद्धि के लिए बच्चों का इस दुनिया में लाना कोई बड़ी बात नहीं, बड़ी बात है उनको सही दिशा दिखाना, उनमें सुसंस्कार उत्पन्न करना, अच्छे-बुरे का ज्ञान कराना, जो केवल उसके माँ-बाप ही करा सकते हैं, कोई और नहीं।
सुसंस्कृत बनाने अथवा उनमें अच्छे संस्कार जगाने के लिए यह बात बहुत ही जरूरी होती है कि हम अपना जितना समय घूमने-फिरने या यार-दोस्तों की महफ़िल सजाने में बिताते हैं, उतना समय अपने बच्चों की जिज्ञासा को शांत करने में लगाएं।
बच्चों का उद्दंड अथवा शैतान बनाने में भी माँ-बाप उतने ही सहायक होते हैं जितने कि बच्चे स्वयं। होता यह है कि जब माँ अथवा बाप बच्चे की तरफ ध्यान नहीं देते, तब बच्चा अपनी ओर ध्यान आकर्षित करवाने के लिए कुछ ऐसे क्रियाकलापों का सहारा लेता है, जिनसे माँ-बाप का ध्यान उसकी ओर आकर्षित हो। उसे भी परिवार का सदस्य मान कर उसकी भी समस्याओं की तरफ ध्यान दिया जाये। उसे भी वही इज़्ज़त दी जाये जिसका वह हकदार है। पर हो इसका उल्टा जाता है। उसके क्रियाकलापों को या तो नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है अथवा उसे नालायक-निकम्मा आदि विशेषणों से युक्त कर डांट-फटकार कर भगा दिया जाता है। उसके मन में झाँकने की बजाय, उसके मन की बातों को समझने अथवा उसकी समस्याओं को दूर करने की बजाय हम उससे स्वयं को दूर करते जाते हैं और जैसे-जैसे समय बीतता जाता है बच्चों और उनके माँ-बाप के बीच की खाई इतनी चौड़ी होती जाती है कि फिर उनका कमाया हुआ पैसा भी उस खाई को नहीं भर पाता और फिर माँ-बाप सोचने बैठ जाते हैं कि सारी उम्र का कमाया पैसा हमने किसके लिए? अपने लिए या फिर खाई के उस पार खड़े  बच्चों के लिए ?

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