शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

WOHMAINNAHIN PART XII

 नहीं, मैं तुम्हें नहीं देख रहा था।

फिर झूठ!

चलो फिर, बताता हूँ | अगर तुम यहीं पर पटरी पर बैठने का फैसला लेते हो तो  ये मत सोचना कि उसके बाद तुम्हारी सभी समस्याओं का हल हो जायेगा | असली समस्याएं तो उसी के बाद शुरू होंगी और वह तब तक रहेंगी, जब तक कि वह समय नहीं आ जाता, जब तक तुम्हें दुनिया में रहने का समय था।  

मतलब...  

मतलब क्या? इतनी छोटी-सी बात भी समझ नहीं आ रही? तुम्हारी "मुक्ति"  चाहे वह इंसान के रूप में हो या फिर भूत-प्रेत योनि में। जो समय मौत के देवता ने तुम्हारे लिए निर्धारित किया है, उससे पहले तुम यह दुनिया नहीं छोड़ पाओगे।  

समझे!

और एक बात...  

यदि तुम एक बार इस दुनिया को छोड़ हमारी दुनिया में आ जाओगे तो यहाँ की एक बात और तुम्हें बता दूँ। यह मत सोचना कि मैं तुम्हें डरा रहा हूँ, बल्कि एक हकीकत बयान कर रहा हूँ। जैसे तुम इंसानों की दुनिया होती है, वैसे ही इन भूत-प्रेतों की भी दुनिया होती है। जैसे तुम्हारी दुनिया में अच्छे और बुरे व्यक्तियों की श्रेणी होती है, वैसे ही हमारी इस दुनिया में अच्छे और बुरे भूत-प्रेत भी होते हैं।  

हमारी दुनिया में जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, हम भी बूढ़े होते हैं, हमारा भी स्थान बदलता जाता है। पहले मशान, फिर भूत, फिर प्रेत, फिर पिशाच, फिर नर पिशाच, फिर ब्रह्म राक्षस, जो हमारी इस दुनिया का "हेड" होता है। वह एक तरह से हमारी दुनिया का प्रधानमंत्री होता है। बस फर्क इतना ही होता है कि तुम्हारी दुनिया झूठ-फरेब और रिश्वत से भरी होती है और हमारी इस दुनिया में ये सब कुछ नहीं चलता। इसीलिए हमारी दुनिया में तुम्हारी दुनिया से कुछ भी लाने की इजाजत नहीं है, नहीं तो हमारी इस दुनिया को भी लोग "अपनी दुनिया" की तरह "गंदा"  कर देंगे।

अब मेरी सोचने की बारी थी। वैसे मैं तुमसे एक बात और पूछना चाहता हूँ।  

पूछो...

लोग तो भूत-प्रेतों के नाम से ही डरते हैं।  

हाँ-डरते हैं, लेकिन डरना नहीं चाहिए।  

क्यों?  

क्योंकि हर भूत-प्रेत एक जैसे नहीं होते।  

जैसे...  जो इंसान अपनी जिंदगी में हमेशा विचलित रहता है और इसी विचलन के कारण जब वह अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठता है, तब वह हमारी 'दुनिया' में आ जाता है। जब उसे अपनी दुनिया में ही चैन नहीं मिला तो यहाँ कैसे मिलता।  इसलिए यहाँ पर भी वह खुराफातें करने से बाज नहीं आते। कुछ ऐसे भी इंसान होते हैं, जो किसी हादसे का शिकार होकर हमारी इस दुनिया में आ जाते हैं। वे इंसान की योनि में भी शांति के साथ जीवन बिता रहे होते हैं तो यहाँ पर भी वह शांति के साथ जीवन बिता रहे होते हैं तो यहाँ पर भी वह शांति के साथ तब तक समय बिता देते हैं, जब तक उन्हें 'मुक्ति' नहीं मिल जाती। वे हमेशा 'सहायता' करने के लिए तैयार रहते हैं। कुछ मेरे जैसे भी होते हैं, जो इस योनि से छुटकारा पाने के लिए 'अच्छे कर्मों' का सहारा लेते हैं और जल्द से जल्द इस योनि से छुटकारा पा जाते हैं। तुम एक पवित्र आत्मा हो, 'मैं' तुम्हारे साथ रहकर तुम्हारी सहायता करूँगा और अपनी इस योनि से जल्द से जल्द छुटकारा भी पा लूँगा। कहो, क्या तुम मेरी सहायता करोगे?"

लेकिन मैं तुम्हारी सहायता कैसे कर सकता हूँ क्योंकि न तो तुम दिखाई देते हो और फिर मैं तुम्हें छू भी तो नहीं सकता और फिर तुम मुझसे किस प्रकार की सहायता चाहते हो?

वैसे एक बात बताओ!  

पूछो।  

तुम यहाँ किसलिए आए थे? अपने अकेलेपन से घबराकर न...  

हाँ तो फिर।  

मैं तुम्हारा ये अकेलापन दूर करूँगा, तुम्हारे साथ रहकर।  

बस तुम डरना नहीं।  

जब तुम दिखोगे नहीं तो मेरा अकेलापन दूर कैसे हो जाएगा?  

वो तुम मुझ पर छोड़ो।  

लेकिन जब तक तुम बताओगे नहीं, मैं कैसे कह सकता हूँ कि तुम मेरे साथ रहो या नहीं।  

मैंने कहा न ये सब मुझ पर छोड़ो।  

तो फिर बात पक्की रही। अब तुम घर जाओ।  

लेकिन मैं तो अपने घर से इतनी दूर निकल आया हूँ तुमसे बात करते-करते कि अब मुझे घर पहुँचने में तीन-चार घंटे लग जाएँगे और फिर अब रात के बारह बज रहे हैं।  

तो चलो हम तुम्हें पाँच मिनट में तुम्हारे घर पहुँचा देते हैं। अपनी आँखें बंद करो, हिलना मत और इस बात का भी ध्यान रखना कि आज के बाद 'मैं' तुम्हारे साथ ही रहूँगा और तुम्हें केवल उस समय ही छोड़ा करूँगा, जब अपने 'काम' से  मुझे जाना होगा।  

मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था। आखिर कौन था यह, क्यों मेरे पीछे लगा हुआ था। मैंने आँखें बंद कर लीं। मुझे कुछ भी अहसास नहीं था। 

अहसास तब हुआ, जब मेरे कानों में आवाज गूँजी—आँखें खोलो।  

जब मैंने आँखें खोलीं तो मैं अपनी माँ के पास खड़ा हुआ था। सोते हुए मेरी माँ कितनी अच्छी लग रही थी। मैं उसे देखकर मुस्कुराने लगा। मुझे दिल के किसी कोने में लगा—देखा मैं कितनी बड़ी गलती करने जा रहा था, तभी कानों में फिर आवाज आई—अच्छा, अब तुम सो जाओ, सवेरे मुलाकात होगी और मैं अपनी चारपाई की तरफ बढ़ गया।  

नींद किसे आनी थी। सारी रात इसी उधेड़बुन में गुजर गई कि ये सब हो क्या रहा है।  

(अब 'मैं' चाहता हूँ कि इस 'मैं' को कोई नाम दे दूँ, जिससे आगे की पुस्तक को पढ़ने में कोई कठिनाई न आए। चलो इस 'मैं' को 'धर्मेश' नाम दे देते हैं।)

तो फिर, सवेरा हुआ।  धर्मेश अपने कहे अनुसार आया और अपनी उपस्थिति का अहसास कराया। धर्मेश ने मेरे कान के पास आकर बताया कि अभी दस मिनट बाद पड़ोस में रहने वाले जैन साहब तुम्हें बुलाने वाले हैं।  

पूछा—किसलिए?  

जवाब मिला—काम-धंधे के सिलसिले में।  

और फिर वही हुआ।  

मिसेज जैन ने मेरी माँ को बुलाकर पूछा कि मैं आजकल क्या कर रहा हूँ।  

माँ ने जब उन्हें ये बताया कि मैं सारा दिन आवारागर्दी करके समय बिता रहा  हूँ तो मिसेज जैन ने माँ को मुझे जैन साहब के पास भेजने के लिए कहा। माँ जैन साहब के घर से लौट आई। लौटते ही मुझे जैन साहब से मिलने के लिए कहा।

सर्दियों के दिन थे | जैन साहब बाहर बरामदे में कुर्सी डालकर धूप सेंक रहे थे, जब मैं उनके पास पहुँचा। मुझे देखते ही प्यार से बुलाया और पूछा कि आजकल मैं क्या कर रहा हूँ।  

मुझे अपने दोस्त “धर्मेश” की भी उपस्थिति का अहसास था और इस बात का मुझे डर भी था कि कहीं मैं झूठ न बोल दूँ। अतः मैंने जैन साहब से कह दिया कि मैं आजकल कुछ नहीं कर रहा हूँ।

जैन साहब ने कहा, “अगर तुम आजकल कुछ नहीं कर रहे हो तो शहर की एक पॉश कॉलोनी में समाचार पत्र का एक दफ्तर है, जहाँ मैं जाऊँ और सुबह से शाम तक उस समाचार पत्र के मैनेजर के कमरे की ड्यूटी बजाऊँ।”

धर्मेश ने बताया कि वहाँ से मुझे कुछ भी पैसा नहीं मिलेगा चाहूँ तो पूछ लूँ।  

अब मेरे दिल में चाहत हुई कि इसी बहाने धर्मेश की बातों का भी पता चल जाएगा, अतः मैंने जैन साहब से पूछ ही लिया कि मुझे वहाँ से क्या मिलेगा।

जैन साहब ने उत्तर देने की बजाय उल्टे मुझसे पूछा कि मैं आवारागर्दी करके कितना कमा लेता हूँ? 

अब मेरे कानों में धर्मेश के हँसने की आवाज़ आने लगी। आवाज़ ऐसे थी जैसे कह रही हो—चले थे मेरा इम्तिहान लेने।  

जैसे ही जैन साहब मुझे आज्ञा देकर चले गए, वैसे ही मैंने धर्मेश से पूछ लिया कि क्या मेरा वहाँ जाना ठीक रहेगा?

धर्मेश ने मुझे चुप रहने का इशारा किया और फिर कुछ देर बाद बोला, “हाँ, तुम्हारा जाना ठीक रहेगा।”

अगले ही दिन से मैं उस प्रसिद्ध समाचार पत्र के मैनेजर के कमरे पर ड्यूटी बजाने लगा। ड्यूटी क्या थी, बस, उनको आते-जाते हुए “सैल्यूट” मारना था।

महीना खत्म हुआ। फिर एक दिन मिसेज जैन ने मेरी माँ को बुलाया। माँ के मन में शंका उठी कि कहीं मेरे बेटे ने कुछ उल्टा-सीधा तो नहीं कर दिया।

लेकिन नहीं...  उनके बेटे ने कुछ उल्टा-सीधा नहीं किया था।  तभी तो... मिसेज जैन ने मेरी माँ के हाथों में साठ  रुपये पकड़ा दिए।  

माँ ने प्रश्नसूचक निगाह से देखा तो मिसेज जैन कोतो वह बोलीं कि तेरे बेटे की मेहनत की पहली कमाई है और मिसेज़ जैन बताने लगीं कि कैसे उनके पति अपने दोस्त उस समाचार पत्र के मैनेजर के पास गए थे। बस वहीँ पर मैनेजर साहब ने अपने किसी दूसरे चपरासी के हाथों ये पैसे मँगवाए और जैन साहब को दे दिए थे। जैन साहब ने आज सुबह जाते हुए ये पैसे तुम्हें देने के लिए कहा था, सो मैंने तुम्हें बुलवा कर ये तुम्हारे हवाले कर दिए। अब भगवान ने चाहा तो सब कुछ ठीक हो जाएगा।

अब मानव को वहाँ काम करते ढ़ाई महीने बीत चुके थे कि एक दिन मैनेजर साहब ने उसे बुलाया और अपने पी.ए. से मिलने के लिए कहा। मानव जब पी.ए. के पास पहुँचा तो पी.ए. ने उसे एक फॉर्म के ऊपर दस्तखत करने के लिए कहा। मानव ने जब पूछा तो पता चला कि उसकी पढ़ाई की योग्यता को देखते हुए उसे ऑफिस की जगह कारखाने में काम सीखना होगा।

अब मानव ने फिर धर्मेश को याद किया। धर्मेश अपने “दूसरे काम” पर गया हुआ था। वह किसी को दूसरी दुनिया में छोड़ने के लिए गया हुआ था।

शाम हुई। मानव धर्मेश को याद करते हुए घर पहुँचा। थोड़ी देर बाद अपना “दूसरा काम” निबटाकर धर्मेश भी मानव के पास पहुँच गया।

मानव ने अपनी समस्या बताई कि अब उसे कारखाने में काम सीखने के बाद वहीं नौकरी करनी होगी, ऑफिस में नहीं।  धर्मेश का जवाब सुनकर मानव चौंक गया।

धर्मेश ने कहा, “तुम क्या चाहते हो?”  

मानव बोला—मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी सहायता करो, जिससे मैं कहीं अच्छी नौकरी पा सकूँ।

धर्मेश ने पूछा, “क्या तुम पुनर्जन्म पर विश्वास करते हो?”  

मानव ने सकारात्मक उत्तर में सिर हिलाया।

धर्मेश ने फिर पूछा, “किस तरह विश्वास करते हो?”  इसका मानव के पास कोई जवाब नहीं था।

धर्मेश ने आगे समझाया:  “कर्म तो इंसान के हाथ में होता है, जबकि भाग्य नाम की कोई चीज नहीं होती। भाग्य, ज्योतिष, हस्तरेखा इत्यादि सब कुछ इस दुनिया में ही होता है, जबकि सच्चाई यह है कि कर्म ही सब कुछ होता है।  प्रत्येक जन्म में मनुष्य को अपने कर्मों का हिसाब करने के लिए पुनर्जन्म लेना पड़ता है। जैसे गाय का बच्चा अपनी माँ के साथ बंधा रहता है, वैसे ही पिछले जन्म के कर्म अगले जन्म में साथ ले जाते हैं। इसीलिए इन कर्मों से छुटकारा पाना इतना आसान नहीं होता।”

“यदि तुम इस जन्म में किसी से धोखाधड़ी करके, झूठ बोलकर या लूटपाट करके उसकी चीजें छीन लेते हो तो यह मत सोचना कि तुमने बहुत बड़ा तीर मार लिया। जो तुमने लूटा या छीना, वह तुम इसी दुनिया में छोड़कर जाओगे, लेकिन उसका हिसाब अगले जन्म में चुकाना पड़ेगा। कारखाने में काम करना तो एक माध्यम है। दरअसल, तुमने अपने पिछले जन्म के कर्मों के कारण जैन साहब से मुलाकात की, जिनके माध्यम से तुम इस समाचार पत्र के मैनेजर से मिले और नौकरी मिली। अब इस नौकरी को स्वीकार कर लो। मैं तुम्हारे साथ ही रहूँगा और तुम्हें ऐसी-ऐसी चीजों से अवगत कराऊँगा, जिन्हें देखकर-सोचकर तुम दंग रह जाओगे।”

मानव के पास धर्मेश के तर्कों का कोई जवाब नहीं था। उसने मन ही मन उस नौकरी को स्वीकार कर लिया। अगली सुबह वह जैन साहब से मिला और उन्होंने मैनेजर साहब से कहकर उसकी नौकरी का इंतजाम करवा दिया।


क्या मानव इस नौकरी पर टिक पायेगा या कारखाने की मुश्किलों का सामने घुटने तक देगा ?....

पढ़िए अगले अंक में ... 


wohmainnahin part XI

 उन्होंने कहा कि या तो मैं उनकी “शारीरिक आवश्यकताओं” को पूरा करूँ या उनके वे पैसे लौटा दूँ जो उन्होंने मुझे दिए थे। उन्होंने मुझे देते हुए एक कागज़ पर लिख रखे  थे। मैं तो जैसे आसमान से गिरा। न जाने सच था या झूठ, उन्होंने डेढ़-दो सौ रुपये का हिसाब मेरे सामने रख दिया था।  

अब मैं कहाँ जाऊँ! क्या करूँ!  

मेरे चेहरे की उड़ती हवाइयों को देख पीटी सर ने फिर पलटा खाया कि यदि मैंने अगले दिन तक उनके पैसे नहीं लौटाए तो वह उनके घर पर पहुँचकर उसके माँ-बाप के सामने सारी बात बता देंगे।  

मेरे लिए तो आगे कुआँ पीछे खाई थी।  

जैसे ही पीटी सर ने यह कहा, मुझे पापा के चाँटे की याद हो आई, जो केवल घर देर से लौटने पर लगा था और यहाँ  तो “उधारी” का मामला था। पापा के हाथों वहाँ तो “उधारी” का मामला था। पापा के हाथों में डंडा चमक आया था मेरी कल्पना में।  

मैंने पीटी सर से दो दिन का समय माँगा कि या तो मैं दो दिन में उनके सारे पैसे लौटा दूँगा या फिर उनकी दूसरी बात को मान लूँगा। पीटी सर ने यह कहते हुए कि यदि मैं उन्हें धोखा देने की कोशिश करूँगा तो अच्छा नहीं होगा। वे किसी न किसी तरह से मेरे माँ-बाप तक पहुँच ही जाएँगे।

अब डरने की बारी मेरी थी।  

मुझे कोई आसपास ऐसा नज़र नहीं आ रहा था, जिससे मैं दो सौ रुपये उधार ले सकता। मुझे अब बार-बार यही लग रहा था कि मुझे उनकी “दूसरी शर्त” को ही मानना पड़ेगा।  

ज़िंदगी में “शर्म” का पर्दा ही एक ऐसा होता है, जो एक बार उतर जाए तो दोबारा कभी भी फिट नहीं होता।  

आवाज़ ने कहा—दो बातें बताता हूँ, ज़िंदगी में काम  आएँगी, यदि आज तुम्हें खुदकुशी से बचा सका तो...! सुनो... इंसान की यह फितरत है कि यदि वह किसी भी अच्छे या बुरे काम को एक बार कर लेता है तो चाहकर भी वह उस रास्ते से तौबा करना चाहे तो नहीं कर सकता। वह रोज़ सुबह उठकर उस काम से तौबा तो कर लेगा, लेकिन शाम होते-होते...  

और दूसरी बात... जैसे तीर कमान से... बात ज़ुबान से निकलने के बाद वापस नहीं आती, वैसे ही प्राण शरीर के बाद निकलने के बाद वापस नहीं आते और फिर वही हालत होती है कि अब पछताए होत क्या जब...  जब मैं दो दिनों में दो सौ रुपये का इंतजाम नहीं कर सका तो मैंने पीटी सर की "दूसरी शर्त" को ही मानना उचित समझ लिया | दो दिन बाद पीटी सर ने मुझे एक बच्चे के हाथों बुलवा भेजा...

पीटी सर की नज़र पढ़ कर मैंने भी सिर झुका लिया। एक बार की बेशर्मी ने ज़िंदगी भर की शर्म को उतार फेंका।  

पैसे ने भोलेपन को खरीद लिया था, जिसका फायदा पीटी सर ने ही नहीं, बल्कि मेरे सगे रिश्तेदारों ने भी उठाया।  जीभ के चटखारों ने मुझे पूरी तरह से बेशर्म बना दिया था। ऐसी बेशर्मी भी कहीं छुपाई जा सकती है?  

मैं बदनाम होता जा रहा था। और एक दिन...!  

यह बदनामी मेरे घर तक भी आ पहुँची। हुआ यूं कि मैं अपने पापा के साथ बाज़ार कुछ सामान लेने जा रहा था कि सामने से आते स्कूल के एक लड़के ने मुझे रोका और मुझे पचास रुपये का नोट पकड़ाते हुए बोला कि पीटी सर ने मुझे शाम को बुलाया है।  

पचास के नोट को देख मेरे पापा ने उस लड़के से पूछ लिया कि क्यों बुलाया है। तब लड़के ने रहस्यमयी मुस्कान के साथ मेरी तरफ देखा और मेरे पापा को सारी बात बता दी। बात सुनते ही मेरे पापा चक्कर खाकर गिर पड़े। उनका बेटा और ऐसी गंदी हरकत!  

चंद रुपयों के लिए... छी:!  

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसे समय में मुझे क्या करना चाहिए।  

मैंने अपने पापा की तरफ बढ़ना शुरू किया, जो इस समय बराबर के मकान की दीवार पकड़कर बैठ गए थे। मैंने इधर-उधर सहायता के लिए देखना शुरू किया। मुझे देखते हुए इधर-उधर से जो लोग जा रहे थे, वे रुक गए।  

उनमें से एक-दो व्यक्ति आगे बढ़े। उन्होंने मेरे पिता को देखने के बाद एक-दूसरे को देखा। मेरा मन कुछ आशंकित-सा हो उठा। मैं अपने पापा के पास पहुँचा और उन्हें हिलाने लगा। पास खड़े व्यक्ति यह सब कुछ देख रहे थे। जैसे ही मैंने अपने पापा को हिलाया, वे एक और लुढ़क गए। पास खड़े कुछ व्यक्तियों के हाथ में पानी की बोतलें भी थीं जिनमें से कुछ ने पानी निकालकर उन्हें पिलाने की कोशिश की, लेकिन कोशिश बेकार गई।  

थोड़ी-सी दूरी पर एक ऑटो वाला खड़ा था। मैंने ऑटो वाले से प्रार्थना की कि वह मेरे पापा को लेकर हमारे घर ले चले। ऑटो वाले को कुछ दया आ गयी और वह मेरे साथ मिलकर पापा को ऑटो में लिटा मेरे घर ले चला। घर पहुँचते ही मैं दौड़कर अपनी माँ के पास पहुँचा और उन्हें सारी बात बताई। मेरी बात सुन कर माँ दौड़ी-दौड़ी बाहर आई और मेरे पापा को देख चीत्कार कर उठी। उनके पीछे आई मेरी बहन और भाई भी स्तब्ध थे। भाई ने उसी ऑटो वाले को कहा कि वह तुरंत अस्पताल चले।  

अब मेरी जगह मेरे भाई ने ले ली थी, परंतु जो होना था, वह हो चुका था। 

 घर में कोहराम मचा था। रिश्तेदारों का आना शुरू हो चुका था। जंगल में आग की तरह खबर सारी रिश्तेदारी में पहुँच चुकी थी।  

दिन बीतते गए!  एक दिन भाई और माँ मेरे स्कूल पहुँचे। मुझे मालूम नहीं, लेकिन शायद, मेरी माँ और भाई को मेरी काली करतूतों का पता चल चुका था, तभी तो उसी दिन से उन दोनों का व्यवहार मेरे प्रति बदल गया था। उनके बदले व्यवहार ने मेरे अंदर जैसे एक आग लगा दी थी। मैं प्रतिशोध लेने के लिए जैसे तैयार हो रहा था।  

प्रतिशोध—किससे?  किसकी गलती थी?  मेरी, मेरे माँ-बाप की या उस पीटी टीचर की?  मन ने एक निर्णय लिया...  

पहले तो उस पीटी टीचर को मार डालूँगा, फिर स्वयं आत्महत्या कर लूँगा। इससे कम से कम परिवार की बदनामी भी होने से बच जाएगी और मैं भी माँ और भाई की नफरत से बच जाऊँगा।  

हाँ, यही ठीक रहेगा, लेकिन इस काम को अंजाम कैसे दे पाऊँगा? कहीं पीटी टीचर के ऊपर हमला करने के आरोप में मैं ही कहीं जेल न पहुँच जाऊँ।  

तो फिर क्या किया जाए...  घोड़े की तरह दौड़ रहे उसके दिमाग में एक बात आई। वह थोड़ी देर बाद ही साइंस लैब की तरफ कदम बढ़ा रहा था।  

लैब-असिस्टेंट उसका दोस्त था। उसने लैब असिस्टेंट से लाग-लपेट की बातें करनी शुरू कर दी। बातों-बातों में उसने साइनायड के बारे में सारी जानकारी ले ली और असिस्टेंट को बातों में लगाकर उससे यह भी पता लगा लिया कि साइनायड रखा कहाँ है?

अगले दिन वह अपने साथ एक “ऑलपिन” ले आया। उसने लैब असिस्टेंट को फिर बातों में लगाया और उससे अनुनय-विनय की कि वह एक बार उस साइनायड को हाथ में लेकर देखना चाहता है। बहुत अनुनय-विनय करने पर और इस शर्त पर कि वह इस बात को किसी को भी नहीं बताएगा कि मैंने साइनायड तुम्हें दिखाया है, दिखाने के लिए तैयार हो गया।

मैं अपनी “ऑलपिन” लिए तैयार था। लैब असिस्टेंट बड़ी ही चालाक भरी नजरों से चारों ओर देखते हुए मुझे चुपचाप उधर ले चला, जहाँ साइनायड रखा हुआ था। लैब असिस्टेंट ने साइनायड की बोतल की तरफ इशारा किया। मैंने उसे उठाने के लिए कहा तो लैब असिस्टेंट उसे उठाने लगा। मैं उसे ऑलपिन में लेने के लिए तैयार था। तभी अचानक मेरे “कौन” कहते ही लैब असिस्टेंट का ध्यान भटका।

सावधानी हटी दुर्घटना घटी! अगले ही पल रुई में लिपटी “ऑलपिन” में साइनायड आ चुका था और बिजली की सी फुर्ती के साथ ही बोतल का ढक्कन भी बंद हो चुका था। अब मैं पीटी टीचर को ढूँढ रहा था।

स्कूल के ग्राउंड की तरफ जाते पीटी टीचर को मैंने आवाज देकर रोका। अपनी एक किताब का बहाना बनाकर कि उसका आज पीरियड था, जो लगता है मैं आपके घर पर भूल आया था, लेने चलना है, क्योंकि उसमें से कुछ “होमवर्क” करना है।

पीटी टीचर ने “अच्छा” कहकर साथ ले चलने के लिए कह दिया। स्कूल से छुट्टी होते ही मैं पीटी टीचर के साथ उनके कमरे की ओर चल दिया।

दिमाग बहुत तेज दौड़ रहा था। चेहरे पर वही भोली मुस्कान बता रही थी कि भोली-भाली शक्ल वाले होते हैं जल्लाद भी। आधे घंटे बाद हम पीटी टीचर के कमरे पर खड़े थे। पीटी टीचर कुटिल मुस्कान के साथ मुझे देख रहे थे और मैं अपनी जेब में पड़ी जहर भरी सुई को।

अब हम दोनों कमरे में प्रवेश कर चुके थे। मैं किताब ढूँढने का बहाना बनाकर उनके कमरे को टटोलने लगा तो वह भी अपने कपड़े उतार बनियान-कच्छे में हो मुझमे भी कुछ "टटोलने" लगे | उनकी मंशा समझ मैं भी कपडे उतारने लगा | असल में मेरा कपड़े उतारने का मकसद ऑलपिन को कार्यान्वित करना था।

जैसे ही रुई में लिपटी ऑलपिन मेरे हाथ में आई, मैंने उसे चुपचाप पीटी सर के शरीर में तब चुभो दिया, जब वह मेरे गालों पर प्यार करने के लिए आतुर हो रहे थे।

ऑलपिन का जहर चुभते ही पीटी सर एक ओर को लुढ़क गए।

मैं चुपचाप उनके कमरे से निकला और बाहर का ताला लगाकर अपने घर की ओर हो लिया। पूरा रास्ता मुझे एक तरफ तो ऐसा लगा जैसे मेरे सीने से बहुत बड़ा बोझ उतर गया है और दूसरी तरफ हर व्यक्ति की निगाह अपनी ओर ही उठती दिख रही थी कि देखो, कातिल जा रहा है!

घर जाकर मैंने माँ से खाना तो माँग लिया, लेकिन खाना खाने की हिम्मत न हुई। कानों में जैसे आवाज गूँज रही थी—तू कातिल है। हाथ में हथकड़ी का अनुभव हो रहा था। जज साहब का निर्णय सुनने के लिए कान जवाब दे चुके थे। फाँसी के फंदे की कल्पना ने पूरे शरीर में पसीने की बूँदें ला दी थीं।

मैंने खाना छोड़ दिया। हाथ-मुँह धोया! कपड़े बदले! जैसे आज तुम अपनी माँ के चेहरे को देखते रहे उसी तरह मैं भी उस दिन अपनी माँ के चेहरे को ठीक उसी तरह देख रहा था।

शाम हुई! आँखों में आँसू दबाए मैं घर से बिना कुछ कहे निकल आया। आज तुम जहाँ से चले हो, ठीक उसी जगह मैं खड़ा हो गया था, आत्महत्या के लिए। मैं अभी सोच ही रहा था कि मेरे बाद मेरी माँ का क्या होगा, दूर से आती ट्रेन की सीटी की आवाज भी मैं न सुन सका और ट्रेन मेरे शरीर को दो भागों में बाँटकर चली गई।

मेरी आत्मा मेरे सामने खड़ी हँस रही थी। मेरी आत्मा के पास ही धीरे-धीरे और भी आत्माओं ने जुड़ना शुरू कर दिया था। अब वो आत्माएँ मेरी आत्मा को मौत के दरबार में ले जाने के लिए तैयार हो रही थीं, जब कि मैं बार-बार उनसे प्रार्थना कर रहा था कि मुझे छोड़ दें ताकि “मैं” अपने शरीर में दोबारा प्रवेश पा सकूँ।

परन्तु आत्माओं ने मुझे नहीं छोड़ा। मेरी विनती पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। बस इतना ही कहा कि जब कोई आत्मा अपने शरीर को छोड़ देती है तो वह दोबारा उस शरीर में प्रवेश नहीं पा सकती। अब वे मुझे “मौत” के “दरबार” में ले जा रहे थे। उनकी भयानक हँसी मुझे बार-बार रोने के लिए मजबूर कर रही थी। उनकी बातें इतनी भयानक थीं कि मुझे लग रहा था मैं भागकर अपनी माँ की गोद से लिपट जाऊँ और फिर कभी भी न निकलूँ।

परन्तु अब ऐसा संभव न था।

मैं उन आत्माओं के साथ सुदूर आकाश में खड़ा था और नीचे “मेरी” लाश के साथ ही लोगों की भीड़ भी बढ़ती जा रही थी। मुझे लग रहा था कि मैं दोबारा उस शरीर में प्रवेश पा जाऊँ और भीड़ को चीरते हुए भागकर अपनी माँ की गोद में छिप जाऊँ।

काश! ऐसा हो पाता!

न जाने कितना चलते-चलते कितने दिनों के बाद मैं उन आत्माओं के साथ, जो अब यमदूतों का रूप ले चुकी थीं, धर्मराज जी के समक्ष खड़ा था। मुझसे आगे भी अनगिनत आत्माएँ खड़ी थीं। उसी दरबार में बैठे चित्रगुप्त जी हर आत्मा के कर्मों का बखान करते और दूर कहीं से एक निर्णायक आवाज आती और उनके दूत उसका पालन करते।

ऐसी आत्माओं को जिनको भयानक से भयानक दंड मिलता, वे उन यमदूतों के चंगुल से निकल भागने का प्रयास भी करतीं, परन्तु किसी को भी सफलता न मिल पाती। उनके असफल प्रयास और भयानक दंड उनके पीछे खड़ी आत्माओं के पसीने ला देते।

खैर, मेरा भी नंबर आया!

मेरे बारे में चित्रगुप्त जी ने पढ़कर सुनाया। “मैं” बीच में बोलने लगा तो एक यमदूत की गदा ने पीठ पर प्रहार कर मुझे चुप रहने के लिए कहा। अपनी सजा सुन के चरणों में जा गिरा और उनसे अपने पापों की माफी माँगने लगा।  

चित्रगुप्त जी ने यमदूतों को इशारा कर मुझे ले जाने के लिए कहा | मैं रोने बैठ गया| तभी एक यमदूत ने कहा कि तुमने जो कर्म किए हैं, उसका फल तो भोगना ही पड़ेगा,  चाहे रोकर भोगो या हँसकर। उसके लिए कोई माफी नहीं है। हाँ, अगर तुम चाहो तो सजा पूरी होने के बाद अच्छे-अच्छे कर्म करके दिखाओगे तो हो सकता है तुम्हें हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाए। परन्तु जो तुमने कर्म किए हैं, उसका फल तो भोगना ही पड़ेगा, चाहे रोकर भोगो या हँसकर।

उन्हीं यमदूतों में वही यमदूत मेरा सबसे अच्छा दोस्त बन गया। अब मैं उसी यमदूत के साथ हर समय रहने लगा। बस हमारा बिछोह तब होता, जब उस यमदूत को किसी को "पृथ्वी" पर से लाना होता। मेरी सजा को मेरे दोस्त ने कई भागों में बाँट दिया था। सजा जो मुझे मिली थी, वह तो मुझे पूरी करनी ही थी | उसे तो मेरा दोस्त भी नहीं हटा सकता था। लेकिन हाँ, उस सजा का "दर्द" जरूर मेरे दोस्त ने कम कर दिया था।  

तब एक दिन...  मेरे इस दोस्त ने मुझसे कहा कि यदि मैं पहले दिन ही झूठ न बोलता और अपने माँ-बाप के गुस्से को सहन कर उन्हें सच बता देता तो न तो मुझे उस पीटी सर की हत्या करनी पड़ती और न ही मुझे गलत रास्तों पर चलना होता।  

...और जब मैं गलत रास्तों पर चलता ही नहीं तो यहाँ पर ये सजा भी नहीं भुगतनी पड़ती! पगले, माँ-बाप तो माँ-बाप ही होते हैं, वे कभी भी अपने बच्चे का बुरा नहीं सोचते। तुम्हारा "दर्द" कम करने के लिए मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ...  

एक शहर में माँ और बेटा रहा करते थे। दोनों की जिंदगी में खुशियाँ ही खुशियाँ भरी पड़ी थी। एक दिन जैसे तुम्हारी जिंदगी में ये पीटी टीचर आए, ठीक वैसे ही उस लड़के की जिंदगी में भी एक लड़की आई। वह लड़की वैश्या थी परन्तु इसका पता उसने लड़के को नहीं लगने दिया था। लड़की ने उस लड़के को अपने प्रेमजाल में इस तरह फाँस रखा था कि वह उसके लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था।  

अब उसकी वही माँ, जो उसके लिए सब कुछ थी, गौण हो गई थी। माँ को भी समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने बेटे को सही राह पर लाने के लिए क्या करे। माँ सही राह पर लाने के लिए बेटे को क्या-क्या कहती, ये सब बातें बेटा उस लड़की को बताता रहता, जिससे लड़के की माँ उस लड़की की आँखों में खटकने लगी थी।  

एक दिन प्रेमालाप में उस लड़की ने लड़के से पूछा कि वह उसके लिए क्या कर सकता है? लड़के का जवाब था, जो वह कहेगी, वह सब कुछ करेगा। तो जानते हो उस लड़की ने क्या कहा?  

उस लड़की ने कहा कि यदि वह शाम तक अपनी माँ का कलेजा लाकर उसे दे देगा तो वह हमेशा-हमेशा के लिए उसी की हो जाएगी। 

बेटा गया माँ के पास और प्रेमांध होकर अपनी माँ का गला काट डाला। फिर माँ की लाश के टुकड़े-टुकड़े किए और लाश में से कलेजा निकालकर उस लड़की को देने के लिए चल दिया। जैसे ही हड़बड़ाहट में वह कमरे की दहलीज पर पहुँचा तो वह दहलीज से टकराकर गिरा और उसके हाथ से वह कलेजा दूर जा गिरा। जैसे ही वह कलेजे के पास पहुँचा, कलेजे में से आवाज आई—बेटा कहीं चोट तो नहीं लगी?  

बेटा तो प्रेम में अंधा के साथ बहरा भी हो गया था। इसलिए उसे माँ के कलेजे की आवाज सुनाई नहीं दी। वह अपनी माँ का कलेजा लेकर जैसे ही उस लड़की के पास पहुँचा तो जानते हो उस लड़की ने क्या उत्तर दिया?  

लड़की बोली, जो अपनी माँ का न हो सका, वह मेरा क्या होगा?  

इसलिए मेरे दोस्त, माँ केवल माँ ही होती है। उसका स्थान कोई नहीं ले सकता। अगर उसकी मार भी पड़ती है तो वह भी बेटे या बेटी को "प्रसाद" समान समझनी चाहिए। हाँ, यदि वह "कलियुगी माँ" है तो मैं कुछ नहीं कह सकता। लेकिन अब जो कुछ होना था, वह तो हो चुका। अब उसे लौटाया तो नहीं जा सकता। हाँ मैं तुम्हारी भलाई के लिए जरूर कुछ करने की कोशिश करूँगा।  

अब मेरी सजा धीरे-धीरे कम होने लगी तब मैंने अपने उस दोस्त से कहा कि मैं यहाँ बहुत घबरा गया हूँ। आत्माओं की चीख-पुकार सुनकर मैं काँप जाता हूँ। जब भी कोई नई आत्मा यहाँ आती है और अपने गुनाहों से तौबा कर सजा से बचना चाहती है तब उसकी चीख-पुकार मेरी जैसी अनेकों-अनेक आत्माओं को हिलाकर रख देती है।  

उनकी "अब नहीं करूँगी", "अब माफ कर दो", "वचन देती हूँ" की चीख-पुकार सुनकर मैं तंग आ गया हूँ। मैंने अपने दोस्त से कहा कि अब मैं उसी के साथ रहना चाहता हूँ। मेरे दोस्त ने मुझसे जो पूछा, उसे सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मेरे दोस्त ने पूछा कि क्या मैं उसके साथ पृथ्वी पर से आत्माएँ लाने के लिए तैयार हूँ और यदि मैं ऐसा करने के तैयार हूँ, तब वह चित्रगुप्त जी और धर्मराज जी से उसके बारे में बात करेगा और उनसे विनती करेगा कि वह मुझे भी अपना दूत बना लें।  

मैंने अपने चारों तरफ देखा। कहीं खून की होली चल रही थी तो कहीं कोड़े बरस रहे थे। चीख-पुकार चारों तरफ हो रही थी। कोई माफी माँग रहा था तो कोई चीखों पर चीखें मार रहा था। सब दर्द के मारे एक-दूसरे को घसीट रहे थे। मेरा हृदय काँप उठा | मुझे लगा कि इससे अच्छा तो मैं अपने दोस्त की बात मान लूं  क्योंकि पृथ्वी पर जो भी जन्मा है, उसे हर हालत में हर कीमत पर मिट जाना है और मिटकर उसे हम सब की तरह अपने कर्मों का हिसाब देने इस दरबार में जरूर आना है।

फिर जब यही सब होना है तो फिर दोस्त के साथ इस काम में बुराई क्या ? दोस्त ने बताया कि पहले तो कुछ समय तक इस काम को करने में बहुत नफरत पैदा होगी, परन्तु जब किसी काम को करने की आदत पड़ जाती है, तब नफरत कब खत्म हो जाती है, पता भी नहीं चलता। हमारा काम तो बस आत्मा को इस "दरबार" में लाकर खड़ा करने का होता है, फिर उसके बाद सजा जो भी मिले, जैसी भी मिले, वह उसी को भोगनी पड़ती है।  

अब मेरी समझ में धीरे-धीरे सब कुछ आता जा रहा था। मुझे अपने दोस्त के साथ ये काम करते-करते कुछ समय हो चला था। तभी हमें एक आत्मा को लाने के लिए आदेश मिला। उसने मुझसे (मानव से) पूछा कि जानते हो वह किसकी आत्मा को लाने के लिए भेजा गया था—वह तुम्हारे पिताजी की आत्मा थी।  

वहीं अस्पताल में जहाँ तुम्हारे पिताजी ने दम तोड़ा था, वहीं दरवाजे पर तुम खड़े हुए अपने परिवार व रिश्तेदारों और पड़ोसियों को देख रहे थे। जिस समय हम तुम्हारे पिताजी की आत्मा को लेकर उस अस्पताल के वार्ड के दरवाजे से बाहर निकले, तब तुम्हारे पिताजी की आत्मा कुछ सेकंड के लिए तुम्हारे पास रुकी थी, जिसे तुम देख नहीं सके थे। तब तुम्हारे पिताजी की आत्मा ने हमें देखा और निकल लिए । तुम सब निष्प्राण अपने पिताजी के शव को देख रहे थे।  

जब हम तुम्हारे पिताजी को ले जा रहे थे, तब उन्होंने हमसे प्रार्थना की थी कि जब हम जब भी इस पृथ्वी पर किसी के प्राणों को लेने के लिए आएँ, तब एक बार तुम्हें संभालने के लिए जरूर आ जाया करें।  

हमने तुम्हारे पिताजी की यह बात स्वीकार कर ली, लेकिन उन्हें एक बात से जरूर अवगत करा दिया कि जिस घड़ी, जिस लम्हे, जिस पल तुम्हारी आत्मा ने तुम्हारे इस शरीर को छोड़ना है, उस समय हम तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर पाएँगे, बल्कि तुम्हारी आत्मा को तुम्हारा शरीर छुड़वाने के लिए मजबूर करेंगे। तुम्हारे पिताजी ने इस बात को इसीलिए स्वीकार कर लिया कि उन्हें पता था इस पृथ्वी पर जितने भी प्राणी हैं, उन सबका काल अपने समय पर निश्चित है। ऐसे ही तुम्हारा काल भी निश्चित है जैसे तुम्हारे दादा-परदादा यहाँ इस धरती पर नहीं रहे उसी तरह तुम भी नहीं रहोगे। वैसे एक बात मैं तुम्हें बता देना चाहता हूँ—यदि तुम आज तक इस पृथ्वी पर जिन्दा हो तो उसका केवल एक कारण है—तुम्हारे पूर्व-जन्म के कर्म। तुम इससे पहले भी चार बार मौत से मुकाबला कर चुके हो। कहो तो "मैं" याद दिलाऊँ।  

बचपन में जब तुम बहुत छोटे थे, रामलीला देखने के लिए अपने एक रिश्तेदार के साथ गए हुए थे, वहीं तुम्हारा दिल घबराने लगा था। वह घबराहट दिल का दौरा पड़ने से पहले की थी। फिर तुम रामलीला छोड़कर अपने उसी रिश्तेदार को लेकर घर भाग आए थे। दूसरी बार जब तुम अपनी दुकान के लिए सामान लेने गए हुए थे और वह सामान का थैला लिए हुए बस के गेट से तुम गिर गए थे और बस का पहिया तुमसे कुछ इंच ही दूर रह गया। तीसरी बार जब तुम दूसरे शहर से, जहाँ तुम्हारी दुकान थी, आ रहे थे और ट्रेन की सबसे निचली पटरी पर जल्दबाजी में  उतरने के लिए खड़े थे। तब किसी ने तुम्हें प्लेटफॉर्म आने से पहले डिब्बे के अंदर फेंका था।  

लेकिन तुम ये सब क्यों बता रहे हो? क्योंकि "मैं" तुम्हारे साथ तब से हूँ, जब तुम बहुत छोटे थे। लेकिन तुम ये  सब क्यों कर रहे थे?  

इसका जवाब मैं नहीं दे सकता। बस, मैं तो इतना बता सकता हूँ कि जब भी कोई आत्मा इस दुनिया में जन्म लेती है, उसी वक्त से "मौत" का दूत उसके साथ लग जाता है। वह उसके अच्छे और बुरे कर्मों का सब हिसाब रखता जाता है और वह तुम्हारी दुनिया में कहते हैं न कि जब घड़ा पाप कर्मों से भर जाता है तो...  

हमारा काम है आत्माओं को ले जाना तो उन्हें बचाने का काम भी हमारे ही सुपुर्द किया जाता है ताकि उन्हें भटकने से बचा सकें, जैसे तुम्हारे साथ हो रहा है। ऐसा इसलिए भी किया जाता है कि इस दुनिया के चलाने वाले ने हर इंसान को एक विशेष काम के लिए इस दुनिया में भेजा होता है, जब वह "विशेष काम" उस आत्मा के द्वारा सम्पन्न हो जाता है, वह उसे किसी भी तरीके से अपने पास बुला लेता है। किसी को किसी की मौत बनाकर भेजता है तो किसी को किसी की जिंदगी। खैर, छोड़ो। अब ये बताओ कि तुम्हारा क्या फैसला है? घर वापस जाना है या मौत को गले लगाने के लिए यहीं पटरी पर बैठना है।

लेकिन तुम्हारे फैसले से पहले एक बात और बता देना जरूरी समझता हूँ। मानव ने इधर-उधर देखा। कोई न था।  

मैंने कहा था न कि मुझे देखने या छूने की कोशिश मत करना।


अब  मानव घर कैसे जायेगा क्योंकि उसके पास तो जाने का कोई साधन ही नहीं था | अब वह क्या करेगा?... 

पढ़िए अगले अंक में ... 

गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

WOHMAINNAHIN PART X

 मरने से उसे बड़ा डर लगता है।  मरने के बाद क्या होगा?  उसके अंदर जो बैठा है, वह कहाँ चला जाएगा?  

तो फिर एक काम किया जाए।  

मौत ऐसी चुनी जाए कि दर्द की छटपटाहट का एहसास तक न हो।  

तो फिर...  रेल के आगे आ जाना।  

कैसा रहेगा रेल के आगे आ जाना।  

हाँ-हाँ, यही ठीक रहेगा। मौत की छटपटाहट का भी पता नहीं चलेगा और  काम भी झटपट हो जाएगा।  

तो फिर पक्का रहा शाम को ही इस काम को अंजाम दे दिया जाए।  

नहीं—थोड़ा सोचा जाए।  

दिमाग में तर्कों की होड़ लगी हुई थी।  


परन्तु आज तक जैसा होता आया है, अच्छाई हार गई, बुराई जीत गई।  

प्रकृति का एक नियम है कि बेशक से बुराई जीत तो जाती है, परन्तु  इस जीत के बाद मन में जो ग्लानि उत्पन्न होती है, उससे पार नहीं पाया जा सकता । अच्छाई बेशक से हार जाए, लेकिन जब उस हार का परिणाम सामने आता, तब लगता है कि हमने यह निर्णय लेकर अच्छा ही किया।  

यह प्रकृति का नियम है।  यहाँ पर भी यही हो रहा था।  

मानव के मन की बुरी प्रवृत्ति मानव के मन पर हावी होती जा रही थी। अच्छाई साथ छोड़ती जा रही थी।  कभी वह अपनी तो कभी अपनी माँ की जिंदगी के बारे में सोचने लगता।  परन्तु अब बुराई ने अच्छाई को पटक दिया था यह कहकर कि स्वाभाविक  मौत हो जाएगी, तब भी तो तेरी माँ को अकेले, और वैसे भी वह  अकेली कहाँ थी, बड़ा भाई तो उनकी देखरेख के लिए है ही, और अगर भाभी के कहने पर  बड़े भाई ने माँ को अकेले छोड़ दिया, तब भी तो उन्हें रहना तो पड़ेगा ही।  

बुराई जीत गई, अच्छाई हार गई।  

शहर के बाहर जो पुल है, वहाँ से रात्रि सात बजे से दस बजे तक रेलों का आवागमन लगा रहता है। वहाँ से रात्रि सात बजे से दस बजे तक रेलों का आवागमन लगा रहता है | वह वहीं जाएगा और दुनिया को अलविदा कह देगा।  

मानव शाम होने का इंतज़ार करने लगा 

शाम के चार बजे थे।  

मानव अपनी माँ के साथ बैठा चाय पी रहा था। अपनी मोटी-मोटी आँखों से अपनी माँ के मासूम चेहरे को देखते हुए सोच रहा था कि माँ, देख लो अपने बेटे को आज के बाद शायद दोबारा नहीं देख पाओगी। तेरी देखभाल के लिए तेरे पास बड़ा बेटा है न, वही आज के बाद तेरी देखभाल करेगा।  

माँ भी बड़े प्यार से मानव को देख जा रही थी।  चाय खत्म करके दोनों उठ खड़े हुए। मानव का दिल कर रहा था कि वह माँ को ऐसे ही देखता रहे।  

बस दो घंटे और... और फिर... वह इस दुनिया को अलविदा कह चुका होगा।  


मन में अभी भी उथल-पुथल मची हुई थी। मेरे जाने के बाद... क्या होगा मेरी माँ का। एक अनबुझ पहेली... समझ में नहीं आ रहा...  

लेकिन अब चाहे जो कुछ हो... अपने निर्णय से नहीं टलेगा... वह।  

उसने आज अगर इस दुनिया को अलविदा कहना है तो कहना है। 

बस यही निर्णय और यह निर्णय लेने में उसे दो घंटे लग गए। इन दो घंटों में उसने अपनी माँ के चेहरे को न जाने कितनी बार देखा होगा... बार-बार यह सोचकर कि क्या होगा... क्या मेरी माँ को मेरी मौत की खबर मिलेगी... क्या सहन कर पाएँगी मेरी माँ की ये दोनों आँखें, जब यह पुलिस के कहने पर मेरी लाश को पहचानेंगी, कितने अनगिनत आँसू ऐसे होंगे, जो जब इनकी आँखों से बाहर नहीं निकल पाएँगे, जब लोग मुझे कहीं भी ले जाने की तैयारी में लगे होंगे।  

मैं कमजोर क्यों पड़ता जा रहा हूँ...  मुझे कमजोर नहीं पड़ना है...  मेरा निर्णय केवल मेरा है...  मुझे अपने निर्णय से हिलाना नहीं है।  

खुदकुशी तो खुदकुशी...सोचकर मानव उठा और चल दिया शहर के उस पुल के पार, जो दूसरे शहरों से जोड़ता था। मानव का निर्णय उसका अपना ही था... वह पुल पर चढ़ गया, जिधर शहर के बाहर रास्ता जाता था... उसी रास्ते पर हो लिया। उसके दिमाग में एक बात थी कि वह भी अपने दोस्त की तरह ही लावारिस घोषित हो जाए और लावरिसियों की तरह ही उसका अंतिम संस्कार कर दिया जाए...  

तभी किसी की आवाज ने उसे चौंका दिया। उसने अपने आसपास देखा! कोई न था। तो फिर ये आवाज कैसी थी!  

कहीं मन का वहम तो नहीं!  

आवाज ने कहा, “नहीं, ये तुम्हारे मन का वहम नहीं है। मैं सचमुच तुम्हीं से मुखातिब हूँ!”  

मानव के चेहरे पर पसीना छलक आया। मौत के पीछे के सन्नाटे ने उसके चेहरे को पसीने से भिगो दिया था। वह इसी डर की वजह से तो मरना नहीं चाहता था। क्या इसी को तो मौत का दर्द नहीं कहते। उसने फिर आसपास देखा।  

आवाज ने उसे अपना परिचय देते हुए बताया कि वह उसे जितना ढूंढ़ने की कोशिश करेगा,  उतना ही वह परेशान हो जाएगा क्योंकि वह उसे दिखेगी नहीं।  

तब फिर.... आवाज ने उसे फिर बताया कि वह उससे बात तो कर सकता है, परन्तु देख नहीं सकता। तो चलो कर लें बातें।  

परन्तु किस तरह की! कौन सी बातों की बात कर रहा है वो! मानव का दिमाग सुन्न हो चला था। उसने इन सब “चीजों” के बारे में सोचा भी न था कि उससे कभी ऐसे भी मुलाकात हो जायेगी।  

खेर... अब मुलाकात हो ही गई है तो...देखा जाएगा...  वह तो खुदकुशी करने आया था। रेल के नीचे आने से अच्छा भगवान ने उसे ऐसी आत्मा के हाथों ही मौत दी हो। रेल के नीचे आने से शायद उसकी आत्मा को कष्ट हो तो कहीं भगवन ने उसे बिना कष्टों के ऐसी मौत भेज दी हो।  

वह उस “आवाज” से बात करने के लिए मन पक्का करने लगा। आवाज ने उससे पूछा कि क्या उसने उससे बात करने के लिए मन पक्का  बना लिया है?  

मानव ने सकारात्मक उत्तर दिया।  

आवाज ने पूछा कि वह यहाँ क्या करने आया है, क्यों करने आया है और कहाँ  से आया है।

मानव ने उसे शहर का नाम बताया और अपनी “खुदकुशी” की बात को  मानने उस "आवाज़" को स्पष्ट रूप से बताया और यह भी कि उसे इस दुनिया में कोई प्यार नहीं करता, इसलिए वह खुदकुशी करना चाहता है। लेकिन तुम कौन हो, मेरे बारे में इतना क्यों पूछ रहे हो, और एक बात जितना तुम पूछ चुके हो, इससे आगे पूछना भी मत!  

मानव ने इतना कह तो दिया, लेकिन उसे लगा कि कहीं “आवाज”  ने इसका  बुरा मान लिया तो... वह तो अभी तक सुनता आया था कि यदि ऐसी "चीज़ें" बुरा मान लेती हैं तो वह फिर अपने अपमान का बदला लिए बिना नहीं मानती | "आवाज़" की फिर आवाज़ आई की वह अपने बारे में सब कुछ बताएगी, लेकिन मानव को वायदा करना होगा कि वह उसकी एक-एक बात को सच्ची मानेगा और अगर उसे लगे कि वाकई में "आवाज़" में एक सच्चाई है तो वह खुदकुशी का विचार त्यागकर वापस अपने घर चला जायेगा | 

मानव ने “आवाज” की आवाज को मान लिया। 

अब “आवाज” ने एक शर्त और लगा दी।  

“आवाज” ने बताया कि वह उसे देखने या छूने की कोशिश भी न करे क्योंकि न तो वह किसी को दिखाई देता है और न ही ऐसी “चीजों” का कोई वजूद होता  है, जिसे छुआ जा सके। हाँ, एक बात है, वह जब तक उसके पास है, दुनिया की कोई भी ताकत उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती।  

मानव को आभास हो चला था कि उसके साथ-साथ कोई चल रहा है।  

“आवाज” ने बताया कि वह “यमदूत” के साथ-साथ “भूत” भी है।  

इतना सुनना था कि मानव के पूरे शरीर में कंपकंपी के साथ पसीना उतर आया। 

उसने चारों तरफ़ देखा तो दूर-दूर तक कोई न था।  

"आवाज़" ने कहा कि अभी तो उसने अपने बारे में एक ही बात बताई है, उसी को सुनकर मानव पसीने से तरबतर हो गया है तो आगे की बातें तो शायद वह सुन ही न सके | मानव ने “आवाज़” से कहा कि वह ऐसी बातें न करे जिनसे उसे डर लगे।  

“आवाज़” ने बताया कि चूंकि खुदकुशी करने के बाद उसे भी उसके जैसा ही बनना है, इसलिए उसे “डरने” की ज़रूरत नहीं है। “आवाज़” ने आगे कहा कि वह उसे डरा नहीं रहा, बल्कि हकीकत से रू-ब-रू करा रहा हूँ। लेकिन खुदकुशी से पहले वह उसकी बात सुन ले, फिर उसके बाद जैसे भी उसकी खुशी हो, वह कर ले | "आवाज़" की बात सुनकर मानव को थोड़ी तसल्ली हुई | "आवाज़" ने बताना शुरू किया कि वह एक ऐसे परिवार से सम्बन्ध रखता था, जो ज्यादा अमीर नहीं तो ज्यादा गरीब भी नहीं था | उच्च मध्यमवर्गीय परिवार था | उसके परिवार में उसके अलावा उसका एक भाई, एक बहन और माँ-बाप थे।  

मैं  बचपन से बहुत गोल-मटोल था। रंग गोरा, सेब जैसे गाल, हमेशा लाल-लाल रहते थे। लड़कियाँ मुझ पर मरती थीं। मेरे गालों पर प्यार करने के लिए बहाने लगाती थीं। कभी कोई बहाना लगाती थीं तो कभी कोई बहाने लगाए जाते थे।  

स्कूल गया तो लड़के “लड़की आ गई” कहकर छेड़ते थे। मैं मटकता था। फिर भी मेरी चाल ऐसी थी कि उसमें अपने-आप “मटकना” आ जाता था। अपने गुरुजनों और माँ-बाप के आशीर्वाद से पढ़ाई में मैं अव्वल था। पांचवीं कक्षा पास करते ही मेरी जिंदगी ने जो बदलाव लिया, उसने आज मुझे इन हालात तक पहुँचा दिया है।  

मानव के पूछने पर कि ऐसा क्या हुआ था, जो आज वह इस हालात में है, तब आवाज़ ने कहना शुरू किया।  

हमारे स्कूल में छठी कक्षा में एक पी.टी. टीचर आए। उनकी नज़र हमेशा मुझ पर ही लगी रहती थी। किसी न किसी बहाने से जहाँ भी होते, मुझे बुलाते। मैं भी उसे गुरुजन का प्यार समझकर उनके पास चला जाता था।  मुझे उनकी दिल की कालस  का पता नहीं था।  

एक दिन वह चॉकलेट लेकर आए। आज उनका कोई भी पीरियड मेरी कक्षा में नहीं था, अतः आधी छुट्टी में एक बच्चे के हाथ मुझे बुलवा भेजा। जब मैं उनके पास पहुँचा तो उन्होंने अपनी दोनों बाहें फैलाकर मुझे गोदी में उठा लिया और झट से मेरे गाल पर एक प्यार किया। तब उन्होंने गोदी में उठाए-उठाए मुझे अपनी जेब से चॉकलेट निकालकर दी। मैं चॉकलेट को गुरुजन का आशीर्वाद समझ रहा था। फिर तो कभी चॉकलेट तो कभी… और एक दिन तो हद ही हो गई!  

मानव ने चौंकने का अभिनय कर आवाज़ को “सामने” आने के लिए प्रार्थना की। 

“आवाज़” ने उसे बताया कि वह पहले ही कह चुका है कि वह उसे देखने का प्रयास न करे, वह समय आने पर सब कुछ बता देगा। मानव ने हिम्मत कर आवाज़ से आगे की बात पूछी, तब आवाज़ ने फिर कहना शुरू किया।  

मेरी माँ की मुझे सख्त हिदायत थी कि मुझे जो कुछ भी खाने में अच्छा लगता है, वे वह चीज़ घर में ही बनाकर मुझे खिला देंगी। मैं कहीं बाहर बाज़ार का कुछ भी नहीं खाऊं, इसलिए मेरे माँ-बाप मुझे जेब-खर्च के नाम पर कुछ भी नहीं देते थे। जबकि मेरा मन भी करता था कि स्कूल के दूसरे बच्चों की तरह स्कूल के बाहर खड़े खोमचे-रेहड़ी  वालों से आइसक्रीम या दालमोठ या टाटरी लेकर मैं भी खाऊं | उन बच्चों को खाता देखकर मेरा भी मन करता था, लेकिन मैं उन बच्चों को ही देखता रहता था।  

ऐसा करते हुए पी.टी. टीचर ने कई बार मुझे देखा। और एक दिन…  उन्होंने फिर एक बच्चे के हाथों मुझे बुलवा लिया। मेरे दोनों लाल-लाल गालों पर उन्होंने फिर एक चुम्बन जड़ दिया और मुझसे भी अपने गालों पर प्यार करने को कहा।  

जब मैंने उनके गालों पर प्यार किया तो उन्होंने अपनी जेब से पाँच रुपये निकालकर मेरे हाथ में दिए और जब भी मेरा दिल कुछ खाने को करे तो मैं उनसे पैसे ले लिया करूँ, कहकर उन्होंने मुझे जाने दिया।  

जेब में पैसे देखकर एक बार तो मन में आया कि ये पैसे मैं लौटा दूँ, लेकिन मेरे बुरे मन ने कहा कि ये पैसे मैंने माँगे थोड़े ही थे। उन्होंने तो अपनी खुशी से दिए हैं।  

मैं पैसे लेकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसके बाद तो जब भी कुछ खाने की इच्छा होती, मैं उनके पास पहुँच जाता और उनसे पैसे लेकर अपनी इच्छापूर्ति कर लेता। 

धीरे-धीरे यह बात सारे स्कूल में फैलने लगी कि मास्टर जी मुझे खाने-पीने के लिए पैसे देते हैं। मैंने एक दिन मास्टर जी से कह भी दिया कि आपके द्वारा पैसे देने की बात मेरे घर तक पहुँच गई है। इसलिए आज के बाद ये बंद और मेरे पापा ने ये पचास रूपए भिजवाए हैं, जो आज तक आपने मुझे थोड़े-थोड़े करके दिए थे | 

मास्टर जी ने रुपये लेने से इंकार कर दिया और फिर एक तरकीब बताई, जिससे उनका “प्यार” मुझ पर ऐसे ही बरसता रहेगा। मास्टर जी का घर स्कूल से थोड़ी ही दूरी पर था।

मास्टर जी की तरकीब के मुताबिक मैं स्कूल से छुट्टी करके सबसे पहले घर जाया करूँ। फिर वहाँ से “फ्री ट्यूशन” का बहाना कर उनके घर पहुँच जाया करूँ। जहाँ पर थोड़ी देर पढ़ने के बाद वे घूमने जाया करेंगे और फिर जो चीज मुझे पसंद आएगी, वे मुझे दिला दिया करेंगे और पचास रुपये उन्होंने घर पर वापस न लौटाने की शर्त पर मुझे वापस कर दिए। मेरे उन पीटी सर ने मुझ जैसे भोले-भाले, सीधे-सादे लड़के को पैसे का पीर बना दिया था।

मेरे पूछने पर कि मैं उनके घर पहुँचूँगा कैसे, तब उन्होंने कहा कि स्कूल की छुट्टी के बाद स्कूल के कोने पर वह मेरा इंतज़ार करेंगे और फिर उसके बाद वे अपना घर दिखाने के लिए मुझे ले चलेंगे। घर दिखाने के बाद वह रिक्शे से मुझे मेरे घर छुड़वा देंगे। मैंने स्वीकृति में सिर हिला दिया।

स्कूल की छुट्टी के बाद मैं अपने पीटी सर के साथ उनका घर देखने के लिए चला गया। थोड़ी देर बाद मैं रिक्शे से घर लौटा तो मैंने गली के नुक्कड़ पर ही रिक्शा रुकवा दिया, जिससे मेरे घर वाले न देख सकें कि मैं रिक्शे से कहाँ से आ रहा हूँ।

घर में घुसते ही माँ ने पूछ लिया कि कहाँ गए थे, मैंने कहा दोस्त के घर गया था।

ऐसा तेरा कौन-सा दोस्त बन गया जिसके घर तू गया था, माँ ने अनुरोध किया कि मैं भी उस दोस्त के घर को देखना चाहूँगी। अब तो मेरे काटो तो खून नहीं।

अब एक झूठ को छिपाने के लिए हज़ार झूठ और बोलने पड़ेंगे।

शाम को पिताजी आए तो माँ ने सभी बातें उनसे कह डाली। अब तो पिता जी भी पीछे पड़ गए कि हम अभी उस दोस्त के घर जाएँगे। मैंने लाख बहाने लगाए कि मैं दोस्त के घर की गली-मोहल्ला भूल गया हूँ।

दोपहर का खाना माँ ने हटा लिया था और रात का खाना पापा जी ने खाने नहीं दिया और उस पर मेरे झूठ पर पिटाई अलग।

रात को घर से बाहर जाने की इज़ाज़त न थी, नहीं तो मास्टर जी द्वारा लौटाया गया पचास के नोट से मैं तो क्या, पड़ोसी भी पेट भर लेते | 

रात को मैंने भयंकर निर्णय ले लिया। अब मैं बाज़ार में ही पेट भरा करूँगा। अब मैं कोई बच्चा तो रहा नहीं कि जब जी चाहा थप्पड़ मार दिया, भूखा रख दिया। बाल मन ने सोच लिया था कि माँ-बाप तो केवल प्यार का दिखावा करते हैं, सच्चाई तो यह है कि प्यार तो मुझे केवल पी.टी. सर ही करते हैं।

मैं जाऊँगा, ज़रूर जाऊँगा अपने पी.टी. सर के पास चाहे मुझे उसके लिए कितने ही झूठ बोलने पड़ें और मैं झूठ का सहारा लेकर पी.टी. सर के पास जाने लगा। लेकिन मेरा ख़याल ग़लत था। मेरी माँ मेरे लिए खाना लगाए बैठी मेरा इंतज़ार कर रही थी। उनके पूछने पर कि मैं कहाँ रह गया था, मैंने झूठ बोल दिया कि मैं अपने दोस्त के घर चला गया था।

माँ ने ताना मारा—तब तो उसने पेट भर खाना भी खिला दिया होगा। माँ ने खाने की थाली सामने से हटा ली। मेरे चेहरे ने मेरे झूठ को पकड़वा दिया था।

काश! उस दिन मैंने झूठ नहीं बोला होता। मेरे भोलेपन पर पैसे की चमक जो चढ़ गई थी। उसी पैसे की चमक ने मेरे भोलेपन को छीन लिया था। पैसा तो पैसा ही होता है न!

एक बात जो उस दिन समझ नहीं आई थी, वो आज समझ आ रही है और वही बात तुम्हें बताता हूँ—पैसा सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है, और कुछ नहीं होते हुए भी सब कुछ है। आई बात समझ में।

मानव ने इंकार में सिर हिला दिया। देखो मानव! जब तक इंसान ज़िंदा रहता है, तब तक “हाय पैसा—हाय पैसा” रहता है और जब बुढ़ापा आता है, तब सबसे पहले यही पैसा साथ छोड़ देता है। पैसा तुम्हें उठाकर श्मशान घाट तो नहीं पहुँचा सकता, परन्तु इस पैसे के कारण जो तुम्हारे चार यार-दोस्त और रिश्तेदार बन जाते हैं, वे ही तुम्हें उठाकर श्मशान तक पहुँचाते हैं। इसलिए नहीं कि वे तुम्हें प्यार करते हैं, वे तुम्हें उठाकर श्मशान तक पहुँचाते हैं। इसलिए नहीं कि वे तुम्हें प्यार करते थे, इज्ज़त करते थे बल्कि इसलिए कि तुम्हें जल्द से जल्द श्मशान पहुँचाकर तुम्हें भुलाकर तुम्हारे द्वारा जमा किए गए पैसे को अपने-आप से ख़र्च कर सकें।

मानव चुपचाप आवाज़ की बातें सुन रहा था।

"आवाज़" ने उसे आगे बताया कि उसे अब तक चटखारे की आदत ऐसी पड़ चुकी थी कि वह उस आदत को चाहकर भी नहीं छोड़ पा रहा था और एक दिन पी.टी. सर ने मेरी इसी “कमज़ोरी” का फ़ायदा उठाना चाहा।

क्या थी मानव की ये कमजोरी?

पढ़िए अगले अंक में। ... 


बुधवार, 24 दिसंबर 2025

वो मैं नहीं - Part 9 (फुल बुक)

मैंने उनसे जब उस मुस्कुराहट का राज पूछा तो उनके चेहरे पर अब मुस्कराहट के साथ लालिमा-सी भी उभर आई थी |  उस झोंपड़ी में वह शादी की पहली रात दोनों ने दूर पड़ी चटाई पर लेटे कर्मेश के पिता और जमीन पर अपने पागल भाई और माँ के साथ लेटी कर्मेश की इस मां ने आँखों ही आँखों में एक-दूसरे को देखते हुए गुजारी।  

अगले दिन मानव के इस दोस्त के पिता दोपहर तक उसी झोंपड़ी में लेटे रहे |  उनके दिमाग में अब एक फितूर उठना शुरू हो गया था।  

क्या उन्होंने ठीक किया?  क्या उन्होंने ठीक नहीं किया?  लेकिन अब हो क्या सकता था?  मन ही मन कोई निर्णय लेकर वे खड़े हो गए।  

आखिरकार उन्होंने भी तो शादी करनी ही थी।  अब अपनी मनपसंद लड़की से कर ली तो इसमें बुराई ही क्या?  

थोड़ी-सी दूरी पर ही घर था जहाँ मानव के इस दोस्त के पिता के मां-बाप यानि इस दोस्त के दादा-दादी रहते थे।  

मन में उधेड़बुन चल रही थी कि यदि मम्मी-पापा ऐसा कहेंगे तो मैं ऐसा कहूंगा, यदि ये कहेंगे तो मैं वो कहूँगा। अपनी तरफ से हर तरह से मनाने की कोशिश करूंगा। शायद मान ही जाएँ! और भी न जाने क्या-क्या निर्णय ले रहे थे कर्मेश के पिता!

घर आ गया था।  हाथ घंटी पर गया।  कर्मेश के पिता की माँ ने दरवाजा खोला। माँ-बेटे की आँखें चार हुईं। तभी पिता भी माँ के पीछे आ खड़े हुए।  

माँ-बाप को सारी बातों की जानकारी थी, तभी तो बाप की आँखों से में अंगारे दिखाई दे रहे थे, जबकि माँ की आँखें चुपचाप थीं। माँ ने एक और हटकर चुपचाप रास्ता दे दिया। मानव के दोस्त कर्मेश के पिता अंदर घर में दाखिल हो गए | वह अपनी चारपाई की तरफ बढ़ चले। नसीहतें शुरू हुई| इज़्ज़त की दुहाई दी गई |  घर  वापस लौट आने के लिए भी कहा | तर्क बढ़ते  चले गए | 

नसीहतों का स्थान अब गुस्से ने ले लिया। इज्जत की दुहाइयाँ भी अब खत्म हो चलीं। न कर्मेश के दादा-दादी टस से मस हुए,  न कर्मेश के पिता ही अपनी जिद से हटे | नतीजा कर्मेश के पिता को उनके पिता ने जमीन-जायदाद और अपने नाते-रिश्तेदारों और यहाँ तक कि परिचितों से भी बेदखल कर दिया।  

कर्मेश के पिता अपने माँ-बाप का घर छोड़ आए। अब क्या होगा कि तर्ज पर शहर की गलियों की खाक छानने लगे। नौकरी का कोई अनुभव था नहीं। पैसे कमाने का तरीका आता नहीं था। अब इतना बड़ा कदम तो जवानी के जोश में उठा लिया था, लेकिन अब... अब क्या?  जो होगा , देखा जाएगा कि तर्ज पर लोगों को काम करते देखा तो ये भी कर लूँगा, वो भी कर लूँगा कहकर आज नहीं कल से शुरू करूँगा, सोचते हुए लगभग शाम को अपनी “ससुराल” यानी वह झोंपड़ी जहाँ तुम्हारे इस दोस्त की माँ अपने भाई और माँ के साथ रहती थी, लौट आए।  

रात्रि को हम तीनों यानी तुम्हारे इस दोस्त की माँ अपने भाई और माँ के साथ अपनी झोंपड़ी में लौट आई। ये झोंपड़ी के बाहर चक्कर लगा रहे थे। अंदर घुसते ही माँ खाना बनाने में जुट गई। भाई अपनी चारपाई पर जा लेटा। मैं अपने इस “पिया” के साथ जमीन पर  जा बैठी | चेहरे पर निराशा के भावों को देखते ही समझने में देर नहीं लगी कि कुछ  भी अच्छा नहीं हुआ है। मैंने उन्हें दिलासा देने की कोशिश की कि जिनके यहाँ मैं काम करती हूँ, उनसे कहने की कोशिश करूँगी कि वे अपने ऑफिस में तुम्हें नौकरी दे दें। दिलासा अच्छा था।  

अगला दिन...  हम उन्हें अपनी झोंपड़ी में सोता छोड़ अपने काम पर चले गए थे।  मैं जिनके घर पर काम करती थी, उनसे अपने पति यानी कर्मेश के पिता के लिए काम देने की प्रार्थना की।  

पहली बार तो उन्हें यह जानकर ही आश्चर्य हुआ कि मेरी शादी हो गई है। अब दूसरा झटका लगना स्वाभाविक ही था कि मेरा पति बेरोजगार है।  मेरे पति यानी कर्मेश के पिता को उन्होंने अगले दिन बुला भेजा। 

बातों ही बातों में मेरे मालिक और मालकिन को मेरे पति के घर वालों यानी  मेरी ससुराल वालों के बारे में पता लग गया।  और... क्यों भी न लगता... केवल सड़क पार का ही तो मामला था। आखिर मेरी ससुराल वाले भी कोई कम थोड़े ही थे। कोठियों में अगर मेरे मालिक और मालकिन की इज़्ज़त थी तो सड़क पार की उस कॉलोनी में मेरी ससुराल की भी तो इज़्ज़त थी | 

मेरे मालिक ने जब मेरे ससुर का नाम सुना तो उन्होंने अपने ऑफिस में काम देने से बिल्कुल इंकार कर दिया था |दिन पर दिन बीतते जा रहे.थे |  

प्यार कहीं दफ़न हो चुका था | प्यार का स्थान खीझ ने जो ले लिया था | बात-बात पर तुनक-तकरार ! जहाँ  भी हम नौकरी के लिए जाते, वहीँ मेरे ससुर की इज़्ज़त पहले पहुँच जाती और फिर वही निराशा ही हाथ लगती जा रही थी | खीझ बढ़ती जा रही थी | 

ऐसे में एक दिन वे घर यानि हमारी “प्यारी झोंपड़ी” में नहीं लौटे ।

म न में शंकाओं ने जन्म लेना शुरू कर दिया था | कहीं आफतों से डर कर घर तो नहीं चले गए होंगे ? भगवान न करे कहीं कुछ हो तो नहीं गया होगा। और...  भी न जाने किन ख्यालों ने मुझे बांध लिया था। मन था कि उन्हें शहर  में  ढूंढ़ने के लिए चल निकलूँ, पर मन में एक विचार बार-बार ये भी आ रहा था कि सुबह तक इंतज़ार कर लूँ |   

आखिरकार सुबह हो गई। देखा, दूर से वे, यानी कर्मेश के पापा, चले आ रहे हैं। हम काम पर जाते-जाते रुक गए।  

माँ अपने बेटे या कहो कि मेरे भाई को लेकर हम दोनों को झोंपड़ी में छोड़  काम पर चली गई। थोड़े गिले-शिकवे हुए! थोड़ी मन-मुनव्वत हुई। लेकिन सारी रात वे कहाँ रहे, इसका कोई जिक्र नहीं किया। मैंने भी उनकी इज्जत रखते हुए पूछ्ना ठीक नहीं समझा | गिले-शिकवों में हम दोनों बह चले। उनकी बाँहों में बँधे मुझे यह झोंपड़ी किसी महल से कम नहीं लग रही थी।  

थोड़ी देर बाद हम दोनों एक-दूसरे से अलग हुए। मेरे पति वहीं लेटे रहे, जबकि मैं नहाने के लिए चली गई। नहा-धोकर मैंने अपने पति के लिए खाना बनाया...  जब तक वे नहाने के लिए चले गए।  

जब तक मेरे पति नहा-धोकर आते, तब तक मैं खाना बना चुकी थी।  मेरे मन में बड़ी ही उत्सुकता थी ये जानने की कि वे रात भर कहाँ रहे। खाना खाते-खाते वह बस खाने की तारीफ करते रहे, जबकि मेरी उत्सुकता ये जानने की थी वह रात भर थे कहाँ ?

खाना खाकर वे फिर चारपाई पर जा लेटे। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं यहाँ रहूँ या अपनी माँ के पास जाऊँ, उनका हाथ बँटाने में? मैंने अपनी माँ के पास जाने का फैसला किया। उनसे तो रात को भी मुलाकात हो जाएगी, तब पूछ लूँगी कि वे रात को कहाँ रहे?

शाम का धुँधलका रात में तब्दील हो रहा था। हम भी अपना काम निबटाकर घर लौटने की तैयारी कर रहे थे। तभी हमारी मालकिन ने हमें ठहरने के लिए कहा। उनके कुछ मेहमानों को आना था लेकिन वे आए नहीं थे। इसलिए उनके लिए जो सब्जियाँ ज्यादा बन गई थीं, उनमें से थोड़ी-थोड़ी निकालकर उन्होंने हमें थमा दी थी। अतः रात थोड़ी और हो चली थी।

मैं अपनी माँ और भाई के साथ घर की ओर बढ़ रही थी। तभी...  मैंने अपने पति को झोंपड़ी से निकलते देखा। मैंने अपनी माँ और भाई को अपने पीछे कर लिया। मेरे पति दबे पाँव बाहर निकल रहे थे। मैंने अपने भाई को माँ के हवाले कर उन्हें झोंपड़ी में जाने को कहा और कुछ दूरी बनाकर अपने पति के पीछे चल दी।

शहर से दूर एक मंडी थी। उसी मंडी के किनारे एक होटल था, जहाँ सब्जी व्यापारी आकर रुकते थे। मेरे पति उस होटल में पहुँचे। वहाँ जाकर उन्होंने कपड़े बदले।  फिर कमरे-कमरे में जाकर उन व्यापारियों के झूठे बर्तन उठाने लगे, जो वहाँ आकर ठहरे हुए थे। मुझे उनकी इस हालत पर बहुत रोना आया। उनका यह हाल मेरे ही तो कारण हुआ है। न वह मुझसे शादी रचाते, न उन्हें घर से बाहर निकलना पड़ता, और न ही उन्हें यहाँ झूठे बर्तन उठाने पड़ते।

मैं न जाने कब सोचते-सोचते उस जगह जा पहुँची, जहाँ मेरे पति झूठे बर्तन साफ कर रहे थे। मैंने भी साड़ी का पल्लू कमर में खोंस लिया था। मेरे पति मुझे वहाँ देखकर हक्के-बक्के रह गए। उनकी काटो तो खून नहीं| उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और लगभग घसीटते हुए मुझे वहाँ से एक कमरे में ले गए। मुझे चुपचाप वहाँ पड़ी चारपाई पर सोने के लिए कहा और कमरे का ताला लगाकर खुद बर्तन धोने चले गए। रात कब गुजर गई, मुझे पता ही नहीं चला।

सवेरे पति महोदय दो कप चाय लेकर सामने खड़े थे। मैंने उनसे तुरंत ये काम छोड़ देने के लिए कहा, तब उनके जवाब ने मुझे जो “सम्मान” दिया, वह मैंने पूरी जिंदगी जोड़ कर रखा है | उन्होंने कहा था कि वे मुझे खुश करने के लिए दुनिया का कोई भी काम करने को तैयार हैं, लेकिन मुझे कमी में नहीं देख सकते, दुखी नहीं देख सकते | आज लगता है कि वे ठीक ही कह रहे थे | 

उन्होंने अपनी बात कभी भी नीचे नहीं गिरने दी। बेशक से जी-तोड़ मेहनत और उस पर रूखी-सूखी रोटी, जिंदगी  ने उन्हें कई बीमारियों से घेर लिया था, परन्तु हिम्मत नहीं हारी, कभी अपने माँ-बाप या रिश्तेदारों के सामने हाथ नहीं फैलाया ताकि उनके परिवार की बेइज्जती न हो।

वे तुम्हारे दोस्त को बचपन से ही पाठ पढ़ाते थे कि गैरतमंद आदमी एक बार ही मरता है जबकि बेगैरत रोज-रोज मरता है। किसी के सामने भी, चाहे वह तुम्हारा रिश्तेदार हो या दोस्त या कोई भी, अगर एक बार हाथ फैला दिया तो तुम कभी भी उसके सामने सीना चौड़ा करके खड़े नहीं हो सकते।

मेरे बेटे यानी तुम्हारे दोस्त ने उसी जिंदगी को ही जिया। अपने पिता के बताये नक़्शे -कदम पर चलकर ही इस दुनिया से अपने पिता के पीछे चला गया। आज मेरे पति और पुत्र दोनों ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन मुझे फख्र है कि मैं ऐसे व्यक्ति  की पत्नी बनी और ऐसे बेटे की माँ बनी जो दोनों ही गैरतमंद थे। अब जब कि मेरे बेटे ने भी ये दुनिया छोड़ दी है, मैं चाहती तो तुम्हारे दोस्त के दादा-दादी के पास जाकर उनसे सहायता ले सकती थी, लेकिन ऐसे गैरतमंद पति और बेटे की माँ होकर मैं ऐसा कैसे कर सकती थी?

मानव को लगा जैसे यह उसकी अपनी कहानी है। उसके पिता भी तो ऐसे ही इस दुनिया से चले गए थे। कर्मेश के पिता ने यह दुनिया नहीं छोड़ी होती, तो क्या उसके दोस्त के साथ ऐसा हादसा होता! शायद नहीं! मानव इन्हीं विचारों की उधेड़बुन में लगा हुआ था और उधर कर्मेश की माँ खाना बनाने में लग गई। खाना बनाने के बाद जब कर्मेश की माँ ने मानव को पुकारना चाहा तो पता चला कि मानव तो अपने घर के लिए निकल चुका है।

मानव अपने दोस्त के घर से तो निकल आया था, परन्तु उसे अपने घर जाने की भी इतनी जल्दी न थी, कौन उसकी राह देख रहा है? सोचते हुए वह पास ही के पार्क में पहुँच गया। एक पेड़ के सहारे अपनी साइकिल खड़ी कर वह वहीं बैठ गया।

क्या उसका भी एक दिन यही हाल होगा? क्या उसकी बीवी और बेटा भी एक दिन ऐसे ही...  क्या हम सभी मध्यमवर्गीय परिवारों में ऐसा ही होता है?  क्या, किसी अमीर के घर में भी ऐसा होता है?  क्या अमीरों के यहाँ कोई मरता भी है?  क्या उनके घर में किसी के मरने पर कोई दुखी भी होता है?  शायद नहीं... उनके घर में तो शायद किसी के मरने पर कोई दुखी नहीं होता... उनके घर में तो किसी आर्थिक नुकसान पर जरूर दो आँसू बहाए जाते होंगे।

इन्हीं तर्कों को सोचते हुए मानव ने एक भयंकर निर्णय लिया—वह शादी ही नहीं करेगा! जब शादी ही नहीं होगी तो बीवी कहाँ होगी और जब बीवी नहीं होगी तो बच्चे कहाँ से होंगे? और अब जो उसने निर्णय लिया—वह इससे भी भयंकर था—और अगर मैं भी अपने दोस्त की राह पर निकल जाऊँ तो न रहेगा बांस और न बजेगी बाँसुरी। न मैं होऊँगा और न ही शादी करनी पड़ेगी।

तभी उसके दिल के नरम कोने ने कहा—ये तो सोच, तुम्हारी माँ का क्या होगा?  उसे कौन संभालेगा? बड़ा भाई है तो संभालने के लिए? मगर बड़े भाई ने भी न संभाला तो! अगर उसकी बीवी ने अपने पति के साथ अलग रहने का निर्णय ले लिया तो!  तो... उसकी माँ तो अकेली रह जाएगी! बुढ़ापे में जब उसके हाथ-पैरों में ताकत नहीं रह जाएगी, तब उसके लिए खाना कौन बनाएगा? देख-भाल कौन करेगा? अगर मेरी बीवी भी ऐसी ही निकली तो... झगड़ालू... क्लेशिनी... तो...  माँ अपने आप अपने को संभाल लेगी। दुनिया में और भी तो माँएँ हैं, जो अकेलेपन की जिंदगी जी रही हैं... और फिर इससे भी बड़ी बात... अगर मुझे ही स्वाभाविक मौत आ गई तो... तब भी तो माँ को भाभी के बुरा निकल जाने पर अपनी देखभाल खुद ही करनी होगी।

तो फिर निर्णय पक्का।  मानव भी अपने इस दोस्त कर्मेश  की राह पर चला जाएगा।  

परन्तु कैसे... उसे मरना तो आता नहीं।

क्या वाकई मानव आत्महत्या की कोशिश करेगा ?... 

पढ़िए अगले अंक में ... 


वो मैं नहीं - Part 8 (फुल बुक)

 वहां कुछ न था...

घर वह जा नहीं सकता था...

कोई दूसरा उसे दिखाई नहीं दे रहा था... क्या करे वह...कहां जाए...

उसे लगा कि उसके सिर के हजारों टुकड़े हो जाएंगे। वह भाग जायेगा। अपने दोस्त को छोड़कर भाग जाएगा... उसको जिसके लिए वह थोड़ी देर पहले ही तो देवता का दर्जा दे रहा था।

तो फिर वह क्या करे... दवा लाने के लिए उसके पास पैसे नहीं! दोस्त की तड़फन उससे देखी जाती नहीं!

वह कुछ सोच केमिस्ट की दुकान की तरफ बढ़ चला। केमिस्ट को उसने डॉक्टर साहब का पर्चा थमा दिया। केमिस्ट ने दवाइयां निकाल उसका पर्चा बना मानव के हाथ में थमा दिया।

मानव ने देखा दवाइयां तीन सौ तीस रुपए की थीं। मानव के पास फूटी कौड़ी भी नहीं थी।

मानव ने पर्ची देख केमिस्ट को कुछ समझाना चाहा। मानव ने हाथ जोड़कर केमिस्ट से वे दवाइयां उधार लेनी चाहीं, लेकिन केमिस्ट ने उसके जुड़े हाथों की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया और अपने लड़के से दवाइयां रखने के लिए कहा।

मानव ने दुबारा हाथ जोड़कर अपने दोस्त की जिंदगी की भीख मांगी। केमिस्ट से प्रार्थना की और यह भी विश्वास दिलाने की कोशिश की कि पैसे उसके घरवाले आएंगे, वह उनसे तुरंत पैसे लेकर दे जाएगा। केमिस्ट ने उसे झिड़क कर भगा दिया।

मानव अपना-सा मुंह लेकर खड़ा रह गया। उसका दिमाग कुछ काम नहीं कर रहा था। भरे मन से वह अस्पताल के आई.सी.यू. विभाग की ओर बढ़ने लगा। उसे पता लग चुका था कि उसका दोस्त बचेगा नहीं।

वह आई.सी.यू. के दरवाजे पर खड़ा था, तभी उसके दोस्त ने उसे बुलाया। कागज और पैन मांगा। मानव भागा हुआ उस जगह पहुंचा, जहां नर्सें बैठी हुई थीं। दो कदम  भागने में ही वह जैसे हांफने लगा था, उसे लगा था कि कहीं उसके ये दो कदम उसके दोस्त की जिंदगी पर भारी न पड़ जाएं।

वहां काउंटर पर रखे कागजों का पैड और नर्स के हाथ में लहराते पैन को उसने लगभग छीन-सा लिया था।

पैन और कागज ले वह अपने दोस्त के पास आया। मानव ने देखा कि उसका दोस्त कुछ बोलना तो चाह रहा है लेकिन बोल नहीं पा रहा है। उसने कागज और पैन उसके बैड के पास रखा और नर्स को बुलाने के लिए फिर नर्स काउंटर के पास दौड़ा और नर्स को ढूंढने लगा, जो वहां नहीं थी।

मानव की समझ में नहीं आ रहा था कि वह यहीं खड़ा रहे या अपने दोस्त की तरफ लौट जाए। उसने मन ही मन सोचा कि दो मिनट इंतजार करने के बाद वह अपने दोस्त की तरफ लौट जाएगा। दो मिनट तो क्या पांच मिनट तक नर्स वहां नहीं आई थी। मानव अपने दोस्त की तरफ उल्टे पांव लौट गया।

लेकिन ये क्या!

मानव जो पैन और कागज अपने दोस्त को देकर आया था, उसका उसके दोस्त ने सदुपयोग करते हुए अपनी मां के नाम के साथ-साथ अपना पता भी लिख इस दुनिया को अलविदा कह चुका था।

मानव ने वह पता लिखा पर्चा अपनी जेब में रख आई.सी.यू. से चुपचाप बाहर आ गया था। अस्पताल से बाहर साइकिल स्टैंड से उसने अपनी साइकिल उठाई और कागज पर लिखे पते की ओर दौड़ चला।

उसके पैरों में पंख लग चुके थे।

मानव को लग रहा था कि उसे गलतफहमी हुई है कि उसका दोस्त इस दुनिया को अलविदा कह चुका है। साइकिल चलाते हुए उसे महसूस हो रहा था कि वह उसकी मां को लेकर जैसे ही अस्पताल पहुंचेगा, डॉक्टर उसे खुशी से लबरेज कर देंगे कि तुम्हारा दोस्त तो केवल एक्टिंग कर रहा था, उसे कुछ नहीं हुआ है। देखो, वह बिल्कुल ठीक-ठाक सामने बैठा है, अब तुम उसे ले जा सकते हो।

और अगर ऐसा न हुआ तो... वह अपने दोस्त के बिना जिंदा कैसे रह पाएगा।

और भी...न जाने कैसे-कैसे ख्याल उसके दिमाग को मथ रहे थे।

थोड़ी ही देर और लगी थी, उसको अपने दोस्त का घर ढूंढने में।

अब वह अपने दोस्त की मां को समझा बुझाकर साइकिल पर वापस लौट रहा था। उस दोस्त की मां साइकिल के कैरियर पर बैठी मानव से कुछ कह रही थी और मानव था कि उसे कुछ सुझाई नहीं दे रहा था, वह तो जल्द से जल्द अपने दोस्त के पास पहुँच जाना चाहता था। तभी तो साइकिल चलाते हुए उसे न तो भूख का अहसास था, न प्यास का | 

थोड़ी सी मशक्कत के बाद मानव अपने दोस्त की मां को लेकर अस्पताल के आई.सी.यू. वार्ड के दरवाजे पर खड़ा नर्स को बता रहा था कि वह उसकी मां को उसके घर से ले आया है। मानव ने देखा कि उस नर्स की आंखों में आंसू हैं और वह एक रास्ते की ओर इशारा कर रही है।

मानव के पूछने पर नर्स ने बताया कि जब वह उसकी मां को लेने के लिए चल दिया था, उसके बाद उसके मुँह दसे खून की उल्टी हुई थी | फिर भी डॉक्टर जितना कर सकते थे, उतना किया, लेकिन उसे बचा नहीं सके | 

नर्स का कहना था कि उसका दोस्त बच तो जाता यदि उसकी पसलियों में आई गुम चोट का पता चल जाता और भी न जाने नर्स क्या-क्या बताती रही, लेकिन मानव अपने दोस्त की मां का हाथ पकड़ कर उस तरफ चल दिया था, जिधर उस नर्स ने रास्ता दिखाया था | वह रास्ता सीधे मॉर्चरी (लावारिस लाशों को रखने की जगह) पर जाकर खत्म होता था | 

मानव अपने दोस्त की माँ का हाथ पकड़कर उस ओर चले जा रहा था, जहाँ उसके दोस्त की लाश रखी हुई थी। अपने बेटे की लाश को देख मां के दिल पर क्या गुजरेगी? सोचते-सोचते मानव मोर्चरी के दरवाजे तक पहुँच गया था। वहाँ उसने अटेंडेंट से बात की। अटेंडेंट उसे एक कोने में ले गया। वहाँ एक लाश चादर में लिपटी जमीन पर रखी हुई थी। मानव अपने साथ-साथ अपने दोस्त की माँ को भी वहीं ले आया था।

अटेंडेंट ने लाश के चेहरे पर से कपड़ा हटाया। जैसे ही कपड़ा हटा, मानव के दोस्त की माँ गिरते-गिरते बची। यदि अटेंडेंट और मानव ने उस माँ को नहीं संभाला होता, तो वह लगभग बेहोश होकर गिर ही पड़ती।

माँ का गला न तो भर्राया और न ही आँखों में आँसू आए।  माँ लगभग शून्यविवेक हो गई थी।

उसने मानव को एक कोने में बुलाया।  

फिर उस माँ ने जो कहा, उस पर तो एक बार मानव को भी अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ।

उस दोस्त की मां ने मानव को अपने दोस्त की लाश को लावारिस बता देने के लिए कहा | मानव ने जब अपने दोस्त की मां से इसका कारण जानना चाहा तो दोस्त की मां ने बताया कि उनके घर में इतने भी पैसे नहीं हैं कि वह अपने बेटे का क्रियाकर्म भी ठीक ढंग से नहीं कर सकती | सुन मानव एकदम सकते में आ गया |

क्या उसके दोस्त का अंतिम संस्कार भी सही ढंग से नहीं हो पायेगा? उसे लगा शायद उसकी एक बात से उसके दोस्त की मां का दिल पसीज जाये, सोच कर मानव ने अपने दोस्त की मां से पूछा कि अगर पास-पड़ोस या नाते-रिश्तेदार जब उनके घर आएं तो क्यों न उनसे थोड़ी-सी सहायता ले ली जाये | 

बात सुनते ही दोस्त की मां के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी | दोस्त की मां ने मानव को बताया कि वह अपने दोस्त की लाश को यहाँ से सीधे श्मशान घाट ले जाये और क्रियाकर्म करवाए | 

मानव को यह मकड़जाल कुछ समझ नहीं आ रहा था।

मानव के चेहरे पर उड़ती हवाइयों को देख दोस्त की मां ने कहा कि पहले हम इस काम को कर लें फिर उसके बाद किसी दिन इस पहेली को सुलझाएगी।

आखिरकार मानव को अपने दोस्त की मां की बात को मानना पड़ा। मानव ने अटेंडेंट से बात की और रियायती दरों पर एम्बुलेंस का इंतजाम हो गया। वह अकेला ही था अपने दोस्त की अन्त्येष्टि करवाने में।

अन्त्येष्टि करवाने के बाद वह सीधा अपने घर चला गया। रह-रह कर उसे अपने दोस्त की याद आ रही थी। क्या यही जिंदगी की रीत है।

मानव को सही राह दिखा खुद दुनिया के पर्दे से विदा हो गया। मानव जितना इस बारे में सोचता, उतना ही ज्यादा परेशान हो जाता था।

वह जितना इस बात को, कि उसका दोस्त नहीं रहा, दिमाग से निकालना चाहता था उतनी ही यह बात उसके दिमाग को मथती रहती थी।

एक दिन दिलासा देने के उद्देश्य से मानव, कर्मेश की मां के पास पहुंच गया और आग्रह करने लगा कि वह उस राज को बताएं जो उन्होंने सबसे छुपाकर रखा था। क्यों नहीं मानव के इस दोस्त की अन्त्येष्टि में कोई नाते रिश्तेदार या पास-पड़ोस के लोग आए।

फिर इस दोस्त की मां ने जो बताया, वह मानव के लिए दुनिया के किसी आश्चर्य से कम नहीं था।  

मानव के इस दोस्त के पिता एक उच्च मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते थे।  

मानव के इस दोस्त का परिवार साधारण-सी कॉलोनी में रहता था। इस कॉलोनी का नाम था *प्रीत विहार*।

सड़क पार एक पॉश कॉलोनी थी। उसी कॉलोनी की एक कोठी में मैं (कर्मेश की मां) अपने पागल भाई के साथ रहती थी। हमारे पापा (कर्मेश के नाना) हमें छोड़कर चले गए थे। तब मैं बहुत छोटी थी। मेरा भाई मुझसे पाँच साल छोटा था।

हमारी माँ ने बहुत मुश्किलों से मुझे और मेरे भाई को पाला। माँ ने हमें दुनिया की सारी खुशियाँ दीं, पर उन पागल कुत्तों की तरफ़ जो मेरी जवानी की तरफ़ आकर्षित हो रहे थे, कभी ध्यान नहीं दिया। ध्यान था तो केवल अपनी माँ और पागल भाई पर। अपने भाई को अपने आँचल में समेटे दुनिया के थपेड़े खाती हुई मैं बड़ी हो रही थी।

ऐसे में तुम्हारे दोस्त के ये पिता, जो मुझे उस कोठी में अपने भाई के साथ आते-जाते देखते थे, एक दिन मेरा पीछा करते हुए मेरे घर तक जा पहुँचे।

मेरा घर क्या, एक झोपड़ी थी जो एक कच्ची कॉलोनी में मेरी माँ ने कुछ लोगों की सहायता से डाली हुई थी।

मैं पीछा करते हुए तुम्हारे इस दोस्त के पिता को देख नहीं सकी। अब तो उन्होंने उस कॉलोनी में मेरे बारे में पूछना शुरू किया और जब संतुष्ट हो गए तो एक दिन घर लौटती मुझे और मेरे भाई को रोक लिया। उनके मुँह से एकदम शादी का प्रस्ताव निकला।

मुझे बहुत गुस्सा आया, ये भी कोई जगह है? मैं चुपचाप कन्नी काटकर एक और ओर से निकल गई।

अगले दिन मैं अपने भाई को लेकर काम के लिए निकल ही रही थी कि सामने तुम्हारे दोस्त के पापा खड़े थे। चेहरों पर स्वाभाविक हँसी ने उनको बहुत ही खूबसूरत बना दिया था। शादी की बात इस झोपड़ी में कैसी रहेगी, कहते-कहते उन्होंने मेरी माँ के कदमों की तरफ़ हाथ बढ़ा दिए।

उनकी इस अदा ने मेरी नजरों में उनके कद को और ऊँचा कर दिया था। हम फिर झोपड़ी का  दरवाजा  खोल अंदर घुस गए |  उस समय मैं सोलह साल की थी। तुम्हारे दोस्त के पापा ज्यादा से ज्यादा बीस साल के रहे होंगे।

उन्होंने मेरी माँ के सामने मुझसे शादी का प्रस्ताव रखा।  मेरी मां ने उन्हें बहुत समझाया | समाज की दुहाई भी दीं, लेकिन वे टस से मस नहीं हुए |  तब कर्मेश के पिता ने कहा कि यदि मेरे घर वाले भी मेरी इस शादी के खिलाफ़ होंगे, तब भी वे शादी मुझसे ही करेंगे। साधारण-सी लड़की के किस गुण पर वे इतना मर-मिटे थे कि मैं खुद नहीं समझ पा रही थी। एक बार तो मैंने भी हिम्मत कर कर्मेश के पिता को मना कर दिया था कि मैं तुमसे शादी नहीं करूँगी। परन्तु उनकी तो जिद थी।

मेरी मां तुम्हारे दोस्त के पिता के घर उनके मां-बाप से मिलने गई|  पहले तो उनकी बड़ी आवभगत की गई, परन्तु जब उन्होंने शादी की बात की तो कर्मेश के पिता के माँ-बाप की आवाज़ बदल गई और आवभगत की जगह धक्कों ने ले ली।

इस बात का पता जब कर्मेश के पिता को लगा तो उन्होंने बिना कुछ सोचे-समझे मुझे और मेरी मां के साथ मेरे भाई को भी साथ लिया और मोहल्ले के मंदिर में ले गए। लग रहा था कि कर्मेश के पिता को सब कुछ बातों की जानकारी पहले से ही थी, तभी तो मंदिर में उन्होंने पुजारी से बात कर उसके पास दो मालाएँ पहले से ही लाकर रख दी थीं। वहाँ हम तीनों को ले जाकर उन्होंने पुजारी से पूजा की थाली और वो दोनों मालाएँ भी मँगवा लीं।

पुजारी जी ने मंत्र पढ़ा और उन्होंने मेरे गले में माला पहना दी। तब पुजारी ने एक मंत्र और पढ़ा और मुझसे उनके गले में माला पहनाने के लिए कहा। मैंने काँपते हाथों से कर्मेश के पिता के गले में माला पहना दी।

ऐसी भी कोई शादी होती है?

तब उन्होंने मेरी माँग में सिंदूर भर दिया और मेरा हाथ पकड़कर मेरी माँ की तरफ़ हो लिए। मेरी माँ के कदमों की तरफ़ हाथ बढ़ाते ही मेरी रुलाई फूट पड़ी। तब उन्होंने जो कहा, उसे सुनकर मेरे दिल में उनकी इज्ज़त और बढ़ गई। वे मेरी माँ और मेरे भाई को भी अपने साथ रखने के लिए तैयार थे।

परन्तु आज...! आज तो उनके पास अपने लिए भी रहने का ठिकाना न था, सो आज उन्होंने अपनी “ससुराल” यानी हमारी झोपड़ी में ही रात गुजारने की सोची। कर्मेश की माँ के चेहरे पर थोड़ी-सी ऐसी मुस्कुराहट फैल आई थी जैसे कि सालों पहले किसी घटना को याद कर फैल जाती है | 

इसके बाद मानव का क्या होगा ?.... 

पढ़िए अगले अंक में ....