बुधवार, 24 दिसंबर 2025

वो मैं नहीं - Part 9 (फुल बुक)

मैंने उनसे जब उस मुस्कुराहट का राज पूछा तो उनके चेहरे पर अब मुस्कराहट के साथ लालिमा-सी भी उभर आई थी |  उस झोंपड़ी में वह शादी की पहली रात दोनों ने दूर पड़ी चटाई पर लेटे कर्मेश के पिता और जमीन पर अपने पागल भाई और माँ के साथ लेटी कर्मेश की इस मां ने आँखों ही आँखों में एक-दूसरे को देखते हुए गुजारी।  

अगले दिन मानव के इस दोस्त के पिता दोपहर तक उसी झोंपड़ी में लेटे रहे |  उनके दिमाग में अब एक फितूर उठना शुरू हो गया था।  

क्या उन्होंने ठीक किया?  क्या उन्होंने ठीक नहीं किया?  लेकिन अब हो क्या सकता था?  मन ही मन कोई निर्णय लेकर वे खड़े हो गए।  

आखिरकार उन्होंने भी तो शादी करनी ही थी।  अब अपनी मनपसंद लड़की से कर ली तो इसमें बुराई ही क्या?  

थोड़ी-सी दूरी पर ही घर था जहाँ मानव के इस दोस्त के पिता के मां-बाप यानि इस दोस्त के दादा-दादी रहते थे।  

मन में उधेड़बुन चल रही थी कि यदि मम्मी-पापा ऐसा कहेंगे तो मैं ऐसा कहूंगा, यदि ये कहेंगे तो मैं वो कहूँगा। अपनी तरफ से हर तरह से मनाने की कोशिश करूंगा। शायद मान ही जाएँ! और भी न जाने क्या-क्या निर्णय ले रहे थे कर्मेश के पिता!

घर आ गया था।  हाथ घंटी पर गया।  कर्मेश के पिता की माँ ने दरवाजा खोला। माँ-बेटे की आँखें चार हुईं। तभी पिता भी माँ के पीछे आ खड़े हुए।  

माँ-बाप को सारी बातों की जानकारी थी, तभी तो बाप की आँखों से में अंगारे दिखाई दे रहे थे, जबकि माँ की आँखें चुपचाप थीं। माँ ने एक और हटकर चुपचाप रास्ता दे दिया। मानव के दोस्त कर्मेश के पिता अंदर घर में दाखिल हो गए | वह अपनी चारपाई की तरफ बढ़ चले। नसीहतें शुरू हुई| इज़्ज़त की दुहाई दी गई |  घर  वापस लौट आने के लिए भी कहा | तर्क बढ़ते  चले गए | 

नसीहतों का स्थान अब गुस्से ने ले लिया। इज्जत की दुहाइयाँ भी अब खत्म हो चलीं। न कर्मेश के दादा-दादी टस से मस हुए,  न कर्मेश के पिता ही अपनी जिद से हटे | नतीजा कर्मेश के पिता को उनके पिता ने जमीन-जायदाद और अपने नाते-रिश्तेदारों और यहाँ तक कि परिचितों से भी बेदखल कर दिया।  

कर्मेश के पिता अपने माँ-बाप का घर छोड़ आए। अब क्या होगा कि तर्ज पर शहर की गलियों की खाक छानने लगे। नौकरी का कोई अनुभव था नहीं। पैसे कमाने का तरीका आता नहीं था। अब इतना बड़ा कदम तो जवानी के जोश में उठा लिया था, लेकिन अब... अब क्या?  जो होगा , देखा जाएगा कि तर्ज पर लोगों को काम करते देखा तो ये भी कर लूँगा, वो भी कर लूँगा कहकर आज नहीं कल से शुरू करूँगा, सोचते हुए लगभग शाम को अपनी “ससुराल” यानी वह झोंपड़ी जहाँ तुम्हारे इस दोस्त की माँ अपने भाई और माँ के साथ रहती थी, लौट आए।  

रात्रि को हम तीनों यानी तुम्हारे इस दोस्त की माँ अपने भाई और माँ के साथ अपनी झोंपड़ी में लौट आई। ये झोंपड़ी के बाहर चक्कर लगा रहे थे। अंदर घुसते ही माँ खाना बनाने में जुट गई। भाई अपनी चारपाई पर जा लेटा। मैं अपने इस “पिया” के साथ जमीन पर  जा बैठी | चेहरे पर निराशा के भावों को देखते ही समझने में देर नहीं लगी कि कुछ  भी अच्छा नहीं हुआ है। मैंने उन्हें दिलासा देने की कोशिश की कि जिनके यहाँ मैं काम करती हूँ, उनसे कहने की कोशिश करूँगी कि वे अपने ऑफिस में तुम्हें नौकरी दे दें। दिलासा अच्छा था।  

अगला दिन...  हम उन्हें अपनी झोंपड़ी में सोता छोड़ अपने काम पर चले गए थे।  मैं जिनके घर पर काम करती थी, उनसे अपने पति यानी कर्मेश के पिता के लिए काम देने की प्रार्थना की।  

पहली बार तो उन्हें यह जानकर ही आश्चर्य हुआ कि मेरी शादी हो गई है। अब दूसरा झटका लगना स्वाभाविक ही था कि मेरा पति बेरोजगार है।  मेरे पति यानी कर्मेश के पिता को उन्होंने अगले दिन बुला भेजा। 

बातों ही बातों में मेरे मालिक और मालकिन को मेरे पति के घर वालों यानी  मेरी ससुराल वालों के बारे में पता लग गया।  और... क्यों भी न लगता... केवल सड़क पार का ही तो मामला था। आखिर मेरी ससुराल वाले भी कोई कम थोड़े ही थे। कोठियों में अगर मेरे मालिक और मालकिन की इज़्ज़त थी तो सड़क पार की उस कॉलोनी में मेरी ससुराल की भी तो इज़्ज़त थी | 

मेरे मालिक ने जब मेरे ससुर का नाम सुना तो उन्होंने अपने ऑफिस में काम देने से बिल्कुल इंकार कर दिया था |दिन पर दिन बीतते जा रहे.थे |  

प्यार कहीं दफ़न हो चुका था | प्यार का स्थान खीझ ने जो ले लिया था | बात-बात पर तुनक-तकरार ! जहाँ  भी हम नौकरी के लिए जाते, वहीँ मेरे ससुर की इज़्ज़त पहले पहुँच जाती और फिर वही निराशा ही हाथ लगती जा रही थी | खीझ बढ़ती जा रही थी | 

ऐसे में एक दिन वे घर यानि हमारी “प्यारी झोंपड़ी” में नहीं लौटे ।

म न में शंकाओं ने जन्म लेना शुरू कर दिया था | कहीं आफतों से डर कर घर तो नहीं चले गए होंगे ? भगवान न करे कहीं कुछ हो तो नहीं गया होगा। और...  भी न जाने किन ख्यालों ने मुझे बांध लिया था। मन था कि उन्हें शहर  में  ढूंढ़ने के लिए चल निकलूँ, पर मन में एक विचार बार-बार ये भी आ रहा था कि सुबह तक इंतज़ार कर लूँ |   

आखिरकार सुबह हो गई। देखा, दूर से वे, यानी कर्मेश के पापा, चले आ रहे हैं। हम काम पर जाते-जाते रुक गए।  

माँ अपने बेटे या कहो कि मेरे भाई को लेकर हम दोनों को झोंपड़ी में छोड़  काम पर चली गई। थोड़े गिले-शिकवे हुए! थोड़ी मन-मुनव्वत हुई। लेकिन सारी रात वे कहाँ रहे, इसका कोई जिक्र नहीं किया। मैंने भी उनकी इज्जत रखते हुए पूछ्ना ठीक नहीं समझा | गिले-शिकवों में हम दोनों बह चले। उनकी बाँहों में बँधे मुझे यह झोंपड़ी किसी महल से कम नहीं लग रही थी।  

थोड़ी देर बाद हम दोनों एक-दूसरे से अलग हुए। मेरे पति वहीं लेटे रहे, जबकि मैं नहाने के लिए चली गई। नहा-धोकर मैंने अपने पति के लिए खाना बनाया...  जब तक वे नहाने के लिए चले गए।  

जब तक मेरे पति नहा-धोकर आते, तब तक मैं खाना बना चुकी थी।  मेरे मन में बड़ी ही उत्सुकता थी ये जानने की कि वे रात भर कहाँ रहे। खाना खाते-खाते वह बस खाने की तारीफ करते रहे, जबकि मेरी उत्सुकता ये जानने की थी वह रात भर थे कहाँ ?

खाना खाकर वे फिर चारपाई पर जा लेटे। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं यहाँ रहूँ या अपनी माँ के पास जाऊँ, उनका हाथ बँटाने में? मैंने अपनी माँ के पास जाने का फैसला किया। उनसे तो रात को भी मुलाकात हो जाएगी, तब पूछ लूँगी कि वे रात को कहाँ रहे?

शाम का धुँधलका रात में तब्दील हो रहा था। हम भी अपना काम निबटाकर घर लौटने की तैयारी कर रहे थे। तभी हमारी मालकिन ने हमें ठहरने के लिए कहा। उनके कुछ मेहमानों को आना था लेकिन वे आए नहीं थे। इसलिए उनके लिए जो सब्जियाँ ज्यादा बन गई थीं, उनमें से थोड़ी-थोड़ी निकालकर उन्होंने हमें थमा दी थी। अतः रात थोड़ी और हो चली थी।

मैं अपनी माँ और भाई के साथ घर की ओर बढ़ रही थी। तभी...  मैंने अपने पति को झोंपड़ी से निकलते देखा। मैंने अपनी माँ और भाई को अपने पीछे कर लिया। मेरे पति दबे पाँव बाहर निकल रहे थे। मैंने अपने भाई को माँ के हवाले कर उन्हें झोंपड़ी में जाने को कहा और कुछ दूरी बनाकर अपने पति के पीछे चल दी।

शहर से दूर एक मंडी थी। उसी मंडी के किनारे एक होटल था, जहाँ सब्जी व्यापारी आकर रुकते थे। मेरे पति उस होटल में पहुँचे। वहाँ जाकर उन्होंने कपड़े बदले।  फिर कमरे-कमरे में जाकर उन व्यापारियों के झूठे बर्तन उठाने लगे, जो वहाँ आकर ठहरे हुए थे। मुझे उनकी इस हालत पर बहुत रोना आया। उनका यह हाल मेरे ही तो कारण हुआ है। न वह मुझसे शादी रचाते, न उन्हें घर से बाहर निकलना पड़ता, और न ही उन्हें यहाँ झूठे बर्तन उठाने पड़ते।

मैं न जाने कब सोचते-सोचते उस जगह जा पहुँची, जहाँ मेरे पति झूठे बर्तन साफ कर रहे थे। मैंने भी साड़ी का पल्लू कमर में खोंस लिया था। मेरे पति मुझे वहाँ देखकर हक्के-बक्के रह गए। उनकी काटो तो खून नहीं| उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और लगभग घसीटते हुए मुझे वहाँ से एक कमरे में ले गए। मुझे चुपचाप वहाँ पड़ी चारपाई पर सोने के लिए कहा और कमरे का ताला लगाकर खुद बर्तन धोने चले गए। रात कब गुजर गई, मुझे पता ही नहीं चला।

सवेरे पति महोदय दो कप चाय लेकर सामने खड़े थे। मैंने उनसे तुरंत ये काम छोड़ देने के लिए कहा, तब उनके जवाब ने मुझे जो “सम्मान” दिया, वह मैंने पूरी जिंदगी जोड़ कर रखा है | उन्होंने कहा था कि वे मुझे खुश करने के लिए दुनिया का कोई भी काम करने को तैयार हैं, लेकिन मुझे कमी में नहीं देख सकते, दुखी नहीं देख सकते | आज लगता है कि वे ठीक ही कह रहे थे | 

उन्होंने अपनी बात कभी भी नीचे नहीं गिरने दी। बेशक से जी-तोड़ मेहनत और उस पर रूखी-सूखी रोटी, जिंदगी  ने उन्हें कई बीमारियों से घेर लिया था, परन्तु हिम्मत नहीं हारी, कभी अपने माँ-बाप या रिश्तेदारों के सामने हाथ नहीं फैलाया ताकि उनके परिवार की बेइज्जती न हो।

वे तुम्हारे दोस्त को बचपन से ही पाठ पढ़ाते थे कि गैरतमंद आदमी एक बार ही मरता है जबकि बेगैरत रोज-रोज मरता है। किसी के सामने भी, चाहे वह तुम्हारा रिश्तेदार हो या दोस्त या कोई भी, अगर एक बार हाथ फैला दिया तो तुम कभी भी उसके सामने सीना चौड़ा करके खड़े नहीं हो सकते।

मेरे बेटे यानी तुम्हारे दोस्त ने उसी जिंदगी को ही जिया। अपने पिता के बताये नक़्शे -कदम पर चलकर ही इस दुनिया से अपने पिता के पीछे चला गया। आज मेरे पति और पुत्र दोनों ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन मुझे फख्र है कि मैं ऐसे व्यक्ति  की पत्नी बनी और ऐसे बेटे की माँ बनी जो दोनों ही गैरतमंद थे। अब जब कि मेरे बेटे ने भी ये दुनिया छोड़ दी है, मैं चाहती तो तुम्हारे दोस्त के दादा-दादी के पास जाकर उनसे सहायता ले सकती थी, लेकिन ऐसे गैरतमंद पति और बेटे की माँ होकर मैं ऐसा कैसे कर सकती थी?

मानव को लगा जैसे यह उसकी अपनी कहानी है। उसके पिता भी तो ऐसे ही इस दुनिया से चले गए थे। कर्मेश के पिता ने यह दुनिया नहीं छोड़ी होती, तो क्या उसके दोस्त के साथ ऐसा हादसा होता! शायद नहीं! मानव इन्हीं विचारों की उधेड़बुन में लगा हुआ था और उधर कर्मेश की माँ खाना बनाने में लग गई। खाना बनाने के बाद जब कर्मेश की माँ ने मानव को पुकारना चाहा तो पता चला कि मानव तो अपने घर के लिए निकल चुका है।

मानव अपने दोस्त के घर से तो निकल आया था, परन्तु उसे अपने घर जाने की भी इतनी जल्दी न थी, कौन उसकी राह देख रहा है? सोचते हुए वह पास ही के पार्क में पहुँच गया। एक पेड़ के सहारे अपनी साइकिल खड़ी कर वह वहीं बैठ गया।

क्या उसका भी एक दिन यही हाल होगा? क्या उसकी बीवी और बेटा भी एक दिन ऐसे ही...  क्या हम सभी मध्यमवर्गीय परिवारों में ऐसा ही होता है?  क्या, किसी अमीर के घर में भी ऐसा होता है?  क्या अमीरों के यहाँ कोई मरता भी है?  क्या उनके घर में किसी के मरने पर कोई दुखी भी होता है?  शायद नहीं... उनके घर में तो शायद किसी के मरने पर कोई दुखी नहीं होता... उनके घर में तो किसी आर्थिक नुकसान पर जरूर दो आँसू बहाए जाते होंगे।

इन्हीं तर्कों को सोचते हुए मानव ने एक भयंकर निर्णय लिया—वह शादी ही नहीं करेगा! जब शादी ही नहीं होगी तो बीवी कहाँ होगी और जब बीवी नहीं होगी तो बच्चे कहाँ से होंगे? और अब जो उसने निर्णय लिया—वह इससे भी भयंकर था—और अगर मैं भी अपने दोस्त की राह पर निकल जाऊँ तो न रहेगा बांस और न बजेगी बाँसुरी। न मैं होऊँगा और न ही शादी करनी पड़ेगी।

तभी उसके दिल के नरम कोने ने कहा—ये तो सोच, तुम्हारी माँ का क्या होगा?  उसे कौन संभालेगा? बड़ा भाई है तो संभालने के लिए? मगर बड़े भाई ने भी न संभाला तो! अगर उसकी बीवी ने अपने पति के साथ अलग रहने का निर्णय ले लिया तो!  तो... उसकी माँ तो अकेली रह जाएगी! बुढ़ापे में जब उसके हाथ-पैरों में ताकत नहीं रह जाएगी, तब उसके लिए खाना कौन बनाएगा? देख-भाल कौन करेगा? अगर मेरी बीवी भी ऐसी ही निकली तो... झगड़ालू... क्लेशिनी... तो...  माँ अपने आप अपने को संभाल लेगी। दुनिया में और भी तो माँएँ हैं, जो अकेलेपन की जिंदगी जी रही हैं... और फिर इससे भी बड़ी बात... अगर मुझे ही स्वाभाविक मौत आ गई तो... तब भी तो माँ को भाभी के बुरा निकल जाने पर अपनी देखभाल खुद ही करनी होगी।

तो फिर निर्णय पक्का।  मानव भी अपने इस दोस्त कर्मेश  की राह पर चला जाएगा।  

परन्तु कैसे... उसे मरना तो आता नहीं।

क्या वाकई मानव आत्महत्या की कोशिश करेगा ?... 

पढ़िए अगले अंक में ... 


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