रविवार, 30 जून 2013

भगवान् के नाम एक खुली चिट्ठी ..!!

हे परमपिता परमेश्वर,
                     सादर चरण स्पर्श !
धरती के तुच्छ प्राणियों की ओर से विनती है कि वे यहाँ पर सकुशल से हैं और आपकी कुशलता ...किससे नेक भला चाहें क्योंकि आप तो स्वयं परमपिता हैं और जो परमपिता होता है उसकी नेक भलाई किससे मांगी जाए !

आगे धरती के स्मचल सुनाए जाएँ, इससे पहले मैं आपको आपकी एक कहानी सुनाना चाहती हूँ । मुझे मेरे बचपन में मेरी माँ ने सुनाई थी, आज इस पत्र के माध्यम से आपको सुनाना चाहती हूँ । वैसे मैं यह भी जानती हूँ की आपने यह कहानी पहले भी सुन रखी होगी !

एक बार आप और आपकी धर्मपत्नी यानि मत महालक्ष्मी में इस बात की शर्त लग गई की आप दोनों में बड़ा

शुक्रवार, 28 जून 2013

तू ल्ह्सेगी मैं मह्सूंगा ..!! (PART - 3)

ख़ैर, शादी वाले दिन पति-पत्नी अपने बच्चे को लेकर चल दिए । जब वे गाँव पहुँचने वाले थे तो पति अपनी पत्नी से बोल कि गाँव के बाहर जो ये पेड़ है, यहाँ पर बच्चे को लिटा जाते हैं । अब शादी का घर है, तू लह्सेगी (इठलाएगी) मैं  मह्सूंगा (रौब दिखाऊंगा), इस होल लिए (बच्चे) को कौन खिलाएगा । पत्नी ने सोचा पति कह तो ठीक रहा है । सो, उसने भी हामी भर दी ! तीन-चार दिन बाद जब पति-पत्नी विदा होकर आये तो देखा बच्चा मृत पड़ा है । अब उन्हें पता चला कि यदि वे भी इस होल लिए (बच्चे) को अपने साथ ले जाते तो  थोड़ी देर पति संभल लेता और थोड़ी देर पत्नी तो उन्हें अपने बच्चे को तो इस तरह ना खोना पड़ता !
थोड़ी देर पहले वह घोंचू - सा लगने वाला वह दोस्त मुझे अब सभी से समझदार लगने लगा था ! इस कहानी के जरिए उसने सभी कुछ तो कह डाला था !

शादी का लड्डू वाकई बहुत मीठा होता है, मगर उसे खाना आना चाहिए ! कुछ लोगों ने इस लड्डू में "कुनैन"

बुधवार, 26 जून 2013

तू ल्ह्सेगी मैं मह्सूंगा ..!! (PART - 2)

"क्यों, क्या उन्होंने आकर कहा था ये लड्डू खाने के लिए ।"

""नहीं, उन्होंने तो नहीं कहा था, मगर मुझे लगता है की ये लड्डू दुनिया में सबसे पहले उन्होंने ही खाया होगा । अगर वे ये लड्डू नहीं खाते तो मेरी पक्की गारंटी है कि ये दुनिया नहीं होती और जब ये दुनिया नहीं होती नहीं होती तो हम भी ना होते और जब हम नहीं होते तो हमें भी ये लड्डू खाने की तबीयत न करती !" सभी दोस्तों ने हाथ मारते हुए खनकती हुई हंसी से बैठकखाना गुंजा दिया !

एक और दोस्त का मानना था कि शादी का लड्डू वह होता है जो लोहे की एक मोटी-सी बॉल के चारों तरफ बूंदी लगा कर खिलाया गया होता है । जब बूंदी ख़तम हो जाती है तो वह लोहे की बॉल मुंह में फंस कर रह जाती है,

तू ल्ह्सेगी मैं मह्सूंगा ..!!

लड्डू का नाम सुनते ही किसके मुंह में पानी ना आ जाएगा और यदि वह लड्डू शादी का हो तो कहने ही क्या ! न - न ! आप गलत समझे, यह लड्डू वह नहीं जो हम - आप किसी बारात में बाराती बन कर गए और वहां रखे मिठाइयों में से लड्डू उठा कर खा गए । यह शादी का लड्डू तो वह होता है, जो हम सब मिल कर "बलि के बकरे " को घोड़ी पर चढ़ा कर ले गए और मंडप के चारों तरफ सात फेरे लगवा कर उस "बलि के बकरे" को वह लड्डू खिला दिया ! अब भला कोई उन भलेमानसों से पूछे कि बकरा भी कभी लड्डू खता है तो उनका जवाब होगा, "जब हमें भी ""बलि का बकरा" बनाया गया था तो हमें भी तो ये शादी का लड्डू खिलाया गया था, अब हमने इसे खिला दिया तो कौन-सा गुनाह कर दिया । वैसे एक राज़ की बात बताऊँ, ये शादी का लड्डू हमने इसे खिला कर   अपनी शादीशुदाओं की बिरादरी में एक की और वृद्धि कर ली है ! अब ये शादी का लड्डू इसे कैसे खाना है, ये इसके ऊपर निर्भर है ! क्योंकि ये शादी का लड्डू दो -चार च्यां - भ्यां के बाद "कुनैन की गोली" की तरह लगने लगता है ! " लड्डू और कुनैन की गोली की तरह ? " हमें कुछ आश्चर्य सा हुआ क्योंकि यह लड्डू तो हमने भी खाया था और हमें तो उसमें कोई कुनैन नज़र नहीं आई थी !

मौका था हमारे साले की शादी का ! एक ही एक तो लाडला साला था हमारा ! साली कोई थी नहीं क्योंकि अगर साली होती तो हमारे साले को शादी के लड्डू के लिए फिर कई साल और रूकना पड़ता क्योंकि उसकी जिद थी कि पहले बहन अपने घर-बार की हो जाए, फिर उसके बाद ही वह शादी करेगा ! अब अगर उसकी कोई दूसरी बहन यानि हमारी साली होती तो फिर उसकी भी तो शादी करनी पड़ती, तभी वह अपनी शादी कर सकता था । अब उसकी बहन अपने घर-बार की हो गई तो उसने भी यह लड्डू खाने का मन बना लिया था ! सब अपने-अपने कामों में लगे हुए थे ! अब हम ठहरे उस घर के दामाद ! हमारे लिए क्या काम ? हम तो बस तैयार हो अपने साले के हमउम्र दोस्तों के साथ उनकी बैठक में बतिया रहे थे ! साले के उन सभी दोस्तों ने शादी का ये लड्डू खा रखा था, सो सभी अपने-अपने अनुभवों से परिचय करवा रहे थे !
"यार, मुझे तो कई बार बहुत गुस्सा  आता है । मुझे लगता है है कि यदि वे दोनों मेरे सामने आ जाएँ तो या तो मैं उन्हें मार दूं या मैं खुद मर जाऊं ।" उनमें से एक दोस्त ने बड़े ही राजदां अंदाज़ में बोला ! 
"वे दोनों कौन ?" हमने भी बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में पुछा !
"अरे वही, आदम और हव्वा " !!

{TO BE CONTD.}

आकाश ..!! (PART - 2)

क्षितिज में, दूर कहीं, जहाँ आकाश मिलता है ,
वहीँ पर एक वायुयान शायद कहीं जा रहा है ,
कहीं जा रहा है या शायद कहीं से आ रहा है ,
आ रहा है या जा रहा है, मुझे इससे क्या ,
क्योंकि मैं  दुनिया में तनहा हूँ ।
घर लोटते हुए, भरी बस में, जवान बोल रहे हैं 
बच्चे चिल्ला रहे हैं, महिलाऐं चुपचाप बैठी हैं ,
पुरुष पसीना सुखा रहे हैं ,
बस में हर स्टॉप पर शोर बढ़ता ही जा रहा है ,
मगर मुझे क्या, क्योंकि इस भरी दुनिया की ,
भरी बस में भी मैं नितान्त तन्हा हूँ ।
बस से उतर कर चलते हुए, चारों तरफ के लोग 
मुझे देख रहे हैं, मुझे ही तो देख रहे हैं ,
गली के वे गंदे बच्चे, जो नाक चाटते ,
माथे पर बेतरतीब से बाल फैले, फटे कपड़े पहने 
शायद इन महलों के पीछे बनी झोंपड़ियों में रहते हैं 
मुझे इन महलों - झोंपड़ियों से क्या ,
क्योंकि मेरी तरह, मेरा यह अधबना कमरा भी 
इन महलों और झोंपड़ियों की तरह तन्हा ही तो है !! 

मुस्कुराहट ..!!

दिल के तारों को छेड़ गई ,
तुम्हारी वह मुस्कुराहट ,
बहार ने पुछा था मुझसे ,
थी किसके आने की यह आहट 
जवाब था मेरा ये शायद ,
तुमने ही तो की थी ये थपथपाहट ,
दिल के तारों को छेड़ गई ,
तुम्हारी वह मुस्कुराहट ,
बहार का ये पूछना दुबारा मुझसे ,
है ये फूलों की ताजगी तुम्हारे कमरे में कैसे ?
सोचता था अब क्या जवाब दूं मैं तुम्हारे आने का !
और क्या - क्योंकि -
हो रही थी मेरे दिल में गुद्बुदाहत ,
दिल के तारों को छेड़ गई ,
तुम्हारी वह मुस्कुराहट ,
अब भी जब याद आता है ,
तुम्हारा वह मुस्कुराना 
तुम्हारे आने से - केवल ,
बहार का आना 
दे जाती है मेरे दिल को केवल एक गुदगुदाहट 
दिल के तारों को छेड़ गई ,
तुम्हारी वह मुस्कुराहट !!

गुमनाम अँधेरे (PART - 2)

गुमनाम अँधेरे , मेरे ,
चारों ओर बिखरते जा रहे हैं ,
मैं उन अंधेरों से, घबरा कर ,
भागता जा रहा हूँ ।
पता नहीं ,
कहाँ तक भागना होगा ,
क्योंकि अँधेरे में ,
मंजिल भी तो नजर नहीं आती ।
मंजिल की तलाश ,
मेरी तरह, तुम्हें भी तो है ।
पर, तुम, रोशनी में नहा कर ,
अपनी मंजिल तलाश कर रहे हो ,
और मैं, गुमनाम अंधेरों में खोकर ,
और शायद यही तुम में और मुझ में ,
फर्क है कि ,
मैं अपनी मंजिल को तलाशता रह जाऊंगा ,
और तुम, अपनी मंजिल को पा लोगे, क्योंकि ,
तुम रोशनी में अपनी मंजिल तलाश कर रहे हो 
और मैं ,
गुमनाम अंधेरों में खोकर । 

जुए का खेल ..!!

मैं ,
आज ,
एक अनदेखी चिता पर ,
जल रहा हूँ ,
अपने ही पापों पर ,
पल रहा हूँ ,
जुआ भी तो ,
एक पाप है ,
सारे जहाँ का ये बाप है ।
बिकवा दे तो 
घर के बर्तन 
बिकवा दे ,
बनवा दे तो ,
कोठियां ही कोठियां बनवा दे ।
हाँ ,
एक ख्वाहिश थी ,
हो मेरी भी एक कोठी ,
पर पड़ गए ,
जान के लाले ,
नसीब भी न हुई रोटी ,
कोठी की लालसा 
मेरी प्रेयसी ने जगाई 
जो - न जाने कहाँ से 
मेरी जिंदगी में आ समाई ,
आज , जब उसे ,
भूखा - नंगा देखता हूँ ,
तो ,कोसता हूँ , 
उस शख्स को 
जिन शख्स ने ,
मुझे ,
ये ,
जुए की लत लगाई !!  

सोमवार, 24 जून 2013

सेल का खेल और क्या ..??

आज महंगाई के इस दौर में, जहाँ हंसी की जगह मायूसी और आराम की जगह भागमभाग ने ले ली है, अगर कुछ अच्छा लगता है तो एक ही शब्द - सेल ! जिसे पढने के बाद लगता है महंगाई तो कहीं है ही नहीं । दो खरीदो एक फ्री या एक के साथ एक फ्री या पचास प्रतिशत सेल या दामो में भरी कमी साठ प्रतिशत तक । परन्तु एक सेल वालों ने तो कमाल ही कर दिया । यह "घुमंतू" जब उस सेल तक पहुंचा तो वहां का नजारा देखिये :
स्थान : शहर का एक बैंक्वेट हॉल !
समय : दोपहर के २ बजे !
घुमंतू को इस सेल में घुसने के लिए बाध्य किया वहां बाहर लगे उनके बैनर ने, जिसमे वे आपके पुराने कपड़ों पर ३०० रुपए से लेकर १५०० रुपए तक कम कर रहे थे । दिमाग घूम गया ! आज जगह - जगह नए - नए कोट और पेंट हजार-बारह सौ में मिल रहे हैं, वहीँ ये सेल वाले १५०० रुपए तक हमारे पुराने कोट पेंट पर दे रहे हैं । रहा नहीं गया और अन्दर घुस गया ।

काउंटर पर बैठे व्यक्ति द्वारा अभिनन्दन और फिर शुरू हुई "सेल" ! एक काउंटर से दूसरा और दूसरे से तीसरे पर पहुँचते-पहुँचते जैकेट के काउंटर पर जा पहुंचे । जैकेट एक पसंद आई । परन्तु जब सेल के पैसे पूछे तो जमीन खिसक गयी । ३५०० रुपए की वह जैकेट, जो शायद आम बाजार में ६-७ सौ से ज्यादा की नहीं थी १५०० रुपए काट कर २००० में वे दे रहे थे ।

जब हम वह काउंटर छोड़ने लगे तो वह खड़े सेल्समैन ने हमे बुलाया और कहा कि यदि पुरानी जैकेट नहीं लाये हो तो कोई बात नहीं । ऐसा करो कि २००० में ये जैकेट ले जाओ और जब भी इधर आना हो, अपनी पुरानी जैकेट दे जाना, हमने कौन सी वे अपने पास रखनी है, जरुरतमंदों को पहुंचानी है । कहने कि आवश्यकता नहीं कि एक तीर से दो निशाने लगाये जा रहे थे । सेल के नाम पर आपकी जेब से दुगने पैसे निकल वाये जा रहे थे और धर्मार्थ के नाम पर आपके पुराने कपड़ों को जरुरतमंदों तक पहुँचाया जा रहा था । अब इससे कोई मतलब नहीं था कि जरुरतमंदों तक वे कपडे पहुंचे या नहीं । 

यही हाल कमीजों के स्टाल का था आम बाजार में जो कमीज़ बमुश्किल ४-५ सौ की होती है, इस सेल में वही कमीज़ ११-१२ सौ की थी और आपकी कमीज़ (फटी-पुरानी) के ३०० रुपए कट कर "सेल" के नाम पर ८०० रुपए की दी जा रही थी । मामला यहाँ पर भी वही था की अपनी फटी-पुरानी कमीज़ बेशक से बाद में दे जाना, अभी तो जेब से ८०० रुपए निकल कर ये कमीज़ ले जाओ ।

दो के साथ एक फ्री या एक के साथ एक फ्री का भी यही हाल है । कहने की जरुरत नहीं की वह पहले से ही सामान का दाम दुगुना कर देते है । घुमंतू एक दिन ऐसे ही एक दूकान में फंस गया । जब घुमंतू ने फ्री की कमीज़ के दाम कम करने के लिए कहा तो दुकानदार का बड़ी सफाई के साथ जवाब था : हुजुर, ये लालच तो हम ग्राहक बनाने के लिए दे रहे हैं, वर्ना आज की महंगाई के इस दौर में हम जैसे गरीब दुकानदार ही जानते हैं की घर चलाने के लिए कई बार व्यवसाय को भी लुटाना पड़ जाता है ! बहरहाल, आपकी मर्ज़ी, यदि आप ये फ्री नहीं लेना चाहते तो मत लो, लेकिन इस कमीज़ के दाम इन दोनों कमीजों के दाम में कम नहीं होंगे ! 

नहीं हो तो ना हों, परन्तु कितनी सफाई से ये सेल और एक के साथ एक फ्री या चार फ्री की स्कीम चल रही हैं सबको जान लेना चाहिए !

ये कैसी विडम्बना (PART - 2)

                                                                          माँ - बेटा ..

ये भी कैसी विडम्बना है कि जिस पानी (माँ) से हम बिजली (बेटा) तैयार करते हैं उसी बिजली की आग को बुझाने के लिए हम पानी का इस्तेमाल नहीं कर सकते !!    

ये कैसी विडम्बना ..

हम प्राणियों की ये कैसी विडम्बना है कि ताउम्र हम जिसे मंदिरों-मस्जिदों-गुरुद्वारों में ढूंढ़ते फिरते हैं जब वह हमे मिलने आता है, अपने साथ ले जाने के लिए आता है तब हम उससे दूर भागने लगते है ये कहकर कि हम अभी जी ही कहाँ पाए हैं, हमे जीने के लिए थोड़ी उम्र तो दे दो । जब हमे जरुरत होगी तब देखेंगे ! 

शनिवार, 22 जून 2013

कौन है वो ?? (PART - 3)

नहीं, क्योंकि हम तो यहीं रह जाते हैं, जाता है तो वह " कोई " , जिसके जाते ही हम निस्तेज हो जाते हैं ! सवाल फिर वहीँ आ जाता है कि ये " कोई " है कौन ? यदि हर प्राणी में इस " कोई " का निवास रहता है, तो फिर जो मरता है, वह " कौन " है ? " कौन " है वह, जो भगवान् के पास चला जाता है ! यदि वह भगवान् है तो उसे फिर पर्दे के पार जाने की जरुरत ही नहीं है और यदि वह " कुछ और " है तो वह " कुछ और " है क्या ? क्या कोई इस पहेली को सुलझा पाएगा ?

शायद नहीं ......!!! 

कौन है वो ?? (PART - 2)

 कहा जाता है कि ऋषि भृगु के पास ही वह शक्ति थी, जिससे वह कभी भी कहीं भी जा सकते थे । इसी शक्ति के बल पर ऋषि भृगु पहले ब्रह्मलोक में ब्रह्मा जी के पास जा पहुंचे थे, तत्पश्चात कैलाश पर्वत पर भगवन शंकर के पास ! जब दोनों देवताओं के पास वे हताश हो गये, तब वे विष्णुलोक में भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उन्हें लात दे मारी ! भगवन विष्णु ने तुरंत उनके पैर पकड़ लिए, तत्पश्चात ऋषिवर ने उन्हें "देवताओं के देवता" की उपाधि से विभूषित किया ! इसका अर्थ है की वेद और उपनिषद भी जिनके गुण गाते हैं, वह कोई ना कोई तो जरुर है, जो ये सब कुछ संभाले हुए है, लेकिन वह है कोन, पर्दे के पीछे कोन बैठा है, जिसको आज तक नहीं खोज पाए !

इंसान अगर अपनी जिंदगी में किसी से डरता है तो वह है मृत्यु ! ये एक सच्चाई है ! इस सच्चाई से हर प्राणी को गुजरना होता है ! हम चाहे कितनी ही दफा कह लें कि हम इस सच्चाई से नहीं डरते, लेकिन हकीकत यह है की हम केवल इसी सच्चाई से डरते हैं ! क्योंकि यही वह पर्दा है, जिसके परे आज तक कोई नहीं देख पाया ! और यही एक पर्दा है, जिसके बाद की जिंदगी को "अब क्या होगा " की सोच और भयानक बना देती है ! परन्तु क्या हम उस पर्दे के पार जाते हैं ?

(TO BE CONTD......)

कौन है वो ?? (PART -1)

यदा-यदा ही धर्मस्य, ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानंधर्मस्य तदात्मानं सृजाभ्यहम ।। (अध्याय - ४, श्लोक ७ )

अर्थात, इस संसार में जब-जब धर्म की हानि होती है, और अधर्म अपने पैर पसारता है, तब-तब धर्म को बचाने के लिए मैं इस धरती पर जन्म लेता हूँ ! आज जब कि चारों तरफ त्राहि-त्राहि मची हुई है, रिश्ते कलंकित हो रहे हैं, चारों तरफ अधर्म का बोल-बाला हो रहा है, तब क्या भगवान् श्री कृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिए इस वचन का पालन होने वाला है ! क्या इस युग में भगवान् का अवतार होने वाला है ? यदि होगा तो संसार उन्हें पहचानेगा कैसे ? कैसा होगा वे ? 

भगवान्,जिसे हम आज कई नामों से पुकारते आये हैं, कभी ईश्वर तो कभी अल्लाह, कभी यीशु मसीह तो कभी महावीर, बुद्ध और भी ना जाने क्या-क्या, वास्तव में है क्या ? क्या कोई उपाधि ? जो किसी भी व्यक्ति को उसके महान कार्यों के बदले दी जाती है ! अगर उसी को भगवान् कहा जाता है, जिसने इस दुनिया में आकर महानतम कार्य किये तो ऐसे इंसानों की कमी नहीं है, जिन्होंने इस दुनिया अथवा समाज में महान काम किये, परन्तु फिर भी वे भगवान् नहीं कहलाये !

परन्तु फिर भी कोई है, जो इस दुनिया को चला रहा है । कौन है वह, कैसा है वह ? कोई नहीं जानता, फिर भी सब जानते हैं कि कोई ना कोई तो जरुर है ! जो संसार के समस्त प्राणियों में समाया हुआ है, उस " कोई " के " प्राणी " को छोड़ते ही सब कुछ क्यूँ ख़तम हो जाता है,जो कल तक हम सब के प्यारे होते हैं, उन्हें अपने ही हाथों अग्नि अथवा पृथ्वी के हवाले क्यों कर आते है । इसका मतलब है कि कोई ना कोई तो जरुर है ! 

इस दुनिया का इतिहास गवाह है कि भगवान् के जितने भी अवतार हुए, ऋषि मुनियों की इस पवन धरती पर ही हुए ! संसार के अधिकतर धार्मिक ग्रन्थ भी इसी पवन धरती पर ही लिखे गए ! चाहे वह "रामचरित मानस " हो अथवा " श्रीमद भगवत गीता " ! और तो और आज जिस चाँद और सूरज को जितने के लिए सारा संसार लगा हुआ है, ये तो हमारे ऋषि-मुनि हजारों हजार साल पहले कर चुके थे ! ऋषि भृगु ने तो उस " कोई " के जाकर लात भी मारी थी ! कहते हैं कि एक बार ऋषि भृगु ने सोंचा कि देवता तो सभी हैं, परन्तु उनमे " देवताओं का भी देवता " कौन है ?

(TO BE CONTD....) 



                  

गुरुवार, 20 जून 2013

रस्में उल्फत ..

करके उल्फत की कसम तूने जो खाई होगी ,
तुझको उस वक़्त मेरी याद तो आई होगी ,
प्यार से मैं तुझे कहता था कभी जाने - वफ़ा ,
और तू मुझसे किया करती पैमाने - वफ़ा ,
जब ये दीवारें वफ़ा तूने गिराई होगी ,
तुझको उस वक़्त मेरी याद तो आई होगी ,

तूने खुद आके मेरे घर को सजाया था कभी ,
प्यार से अपने, मेरे दिल को बसाया था कभी ,
और जब तूने उसे आग लगायी होगी ,
तुझको उस वक़्त मेरी याद तो आई होगी ,

ग़म नहीं तूने जो पैमाने वफ़ा तोड़ दिया ,
दो कदम चलकर अगर साथ मेरा छोड़ दिया ,
अपनी मंजिल को किसी और तरफ मोड़ दिया ,
हाँ अगर राह में ठोकर कोई खाई होगी ,
तुझको उस वक़्त मेरी याद तो आई होगी ,

दिल-नशीं होगा वो किस दर्जा सुहाना मंजर ,
जब दुल्हन बनके चली होगी किसी और के घर ,
बन गयी होगी तू वल्लाह हया का पैकर ,
जब कहारों ने तेरी डोली उठाई होगी ,
तुझको उस वक़्त मेरी याद तो आई होगी ,

अब तेरे देस ना जाऊंगा मैं तेरी खातिर ,
लब पे शिकवा भी ना लूँगा मैं तेरी खातिर ,
ये भी गम शौक से उठाऊंगा मैं तेरी खातिर ,
जब किसी ने मेरी रुददात सुनाई होगी ,
तुझको उस वक़्त मेरी याद तो आई होगी ।।  

दो पंक्तियाँ ..

* छोटा हूँ तो क्या हुआ , जैसे आंसू एक ,
   सागर जैसा स्वाद है , तू चख कर तो देख ।।

* देख तेरे शहर को , भीड़, भीड़ ही भीड़ ,
   तिनके ही तिनके मिले, मिला ना कोई नीड़ ।। 

सोमवार, 17 जून 2013

जिंदगी और मौत..

जिंदगी और मौत के
दरम्यान सोंचता है इंसान ,

कब तक रहूँगा लटका ,
क्योंकि मौत का झटका ,
न जाने कब मुझे ले जाये ,
और ,
ना जाने किस गली में शाम हो जाये ,
इसलिए ,
जिंदगी की शराब की ,
ये चंद बूँद तो पी लूँ ,
किसी गली में ,
जिंदगी की शाम होने से पहले तो
जी लूँ ,
जीने के लिए ,
आखरी जाम तो चढ़ा लूँ ,
किसी को मौत का क्या पता ,
इसी आस पर ,
डूबती शाम को ,
थोडा और बाधा लूँ ।।

गुमनाम अँधेरे..!!

जिंदगी के गुमनाम अंधेरों में ,
खो गया हूँ मैं ,
चला कहाँ से था , मंजिल के लिए ,
आ पहुंचा कहाँ हूँ ,
ये सोच कर रो दिया हूँ मैं ,
जिंदगी के गुमनाम अंधेरों में ,
खो गया हूँ मैं ,

लगता है मंजिल तक ,
नहीं पहुँच पाउँगा ,
बीच में ही किसी रास्ते पर ,
सदा के लिए सो जाऊंगा ,
ये सोंच कर रो दिया हूँ मैं ,
जिंदगी के गुमनाम अंधेरों में ,
खो गया हूँ मैं ,

मंजिल अभी दूर है ,
और जिंदगी की शाम है ,
बोतल हो गयी है खाली ,
मगर लगता है कि जाम है ,
जिंदगी की देख बोतल खाली ,
रो दिया हूँ मैं ,
जिंदगी के गुमनाम अंधेरों में ,
खो गया हूँ मैं !! 

मिलन..!!

आज दिल का मिलन ,
         कुछ गम भी हो कम ,
आजा-आजा अब तो मेरे सनम ।

आज दिल का मिलन ,
          अब उदासी नहीं , जब 
           तुम ही हो संग ,
आजा-आजा अब तो दिल के सनम ।

आज दिल का मिलन 
         जब दिल ही गया ,
          धोखा न हुआ ,
 आजा-आजा तुमको मेरी कसम ।

आज दिल का मिलन ,
          जब तू ही नहीं , तो 
           हम भी नहीं ,
 प्यार करले हमसे घड़ी दो घड़ी ।

आज दिल का मिलन ,
       वो प्यार ही क्या ,
       जब दिल न मिले ,
आजा-आजा पल्लू में , अब तो सनम ।

आज दिल का मिलन ...!!  

एक जिंदगी ऐसी भी !!

मैं अपनी जिंदगी से ,
घबरा गया हूँ ,
चला जाना चाहता हूँ ,
दूर , बहुत दूर , उस 
दूर क्षितिज के पार , जहाँ 
मैं , अपने सपनो का संसार 
रचा सकूँ , बना सकूँ , अपनी 
नगरी में प्रवेश के लिए 
फूलों के द्वार ,
प्रेम की दीवारों से ,
बने घर । और उन घरों तक 
जाने के लिए हों ,
चांदी की सड़कें , जिनके किनारे 
पर खड़े हों , सोने के 
फूलों से लदे वृक्ष , उस नगरी में ,
जहाँ गरीबी न हो ,
मुस्कान बिखेरते सबों के चेहरे ,
मैं ऐसी नगरी बनाना चाहता हूँ ।    

भूख

भूख योँ तो कई तरह की होती है जैसे शारीरिक भूख, मानसिक भूख इत्यादि, लेकिन सबसे बड़ी भूख होती है पेट की भूख ! यह भूख ऐसी होती है, जो इंसान को सचाई के रास्ते से हटा कर बड़े से बड़ा अपराध करने को मजबूर कर देती है । यह भूख हमारे इस दुनिया में कदम रखते ही शुरू हो जाती है और तब तक रहती है, जब तक हम इस दुनिया से कूच नहीं कर जाते ! इस भूख की सबसे बड़ी मजेदार बात है कि यह समय-समय पर अपना रूप भी बदलती रहती है जैसे दुनिया में कदम रखते ही इस भूख को शांत करने के लिए माँ के दूध की आवश्यकता होती है तो बुढ़ापे में जब दांत नहीं होते, तब दूध दलिया , रोटी की जगह ले लेते हैं क्योंकि तब ही मुंह में दांत नहीं होते !

और हमारा सार जीवन इसी भूख को शांत करने में लगा रहता है ! कोटला फीरोजशाह का हरा भरा बाग़ ! चारों तरह हरियाली और उसी हरियाली के नीचे लेटे कुछ नवयुवक ! थका हारा चेहरा और सिरहाने की जगह वह फाइल, जिसमे इनकी डिग्री, शंसा व प्रशंसा पत्र, के साथ-साथ अन्य कागजात, जो उन्हें नौकरी दिलाने में सहायक हो सकते थे । आज भी वे इस आशा के साथ जगे होंगे कि वे इन कागजात के बल पर कहीं ना कहीं नौकरी पा सकने में सफल हो जायेंगे ! सुभ से ही दफ्तर-दफ्तर घूमते थक गए होंगे और जब सफल न हो पाए तो सुस्ताने के लिए यहाँ चले आये होंगे जैसे में चला आया ! मैं भी कौन सा उनसे अलग था ? मेरी भी आँखों में भी सुबह एक चमक थी कि मैं आज जैसे भी हो सकेगा, नौकरी पा कर रहूँगा ! अपनी डिग्रीयां और चेहरे पर फींकी हँसी के साथ मुंह में छिपे सर-सर के शब्द मेरी भूख की व्यथा को छुपा नहीं पा रहे थे ! तभी तो पांच रुपए के छोले-भठूरे की प्लेट यहाँ चला आया था ! घर से लायी पानी की बोतल से दो घूँट पानी निकाल कर पिया ! यह सोच कर की जिन्दगी की इस लड़ाई में मैं अकेला ही नहीं हूँ, मन को कुछ ढाढस बंधाया और समय बर्बाद ना हो, उठ कर चल दिया ।

बाहर निकल कर जेब में हाथ डाला, दफ्तर-दफ्तर घूमते-घूमते चालीस रुपए खर्च हो चले थे । घर से पचास का नोट माँ के हाथ से लेते हुए बड़ी ही शर्म आ रही थी । माँ भी बेचारी क्या करती, इधर-उधर से बचा-बचा कर जो भी जोड़ती थी मेरे दफ्तर-दफ्तर घूमने की भेंट चढ़ जाता था ! महंगाई के इस ज़माने में पिता जी की तनख्वाह भी तो इतनी ना थी की रोज़-रोज़ मुझे पचास के नोट मिल पाते । आखिर भगवान् को कोसने लगा कि क्यों न मुझे भी अंबानी या मित्तल जैसे परिवार में पैदा किया की आज ये दिन मुझे देखने को तो नहीं मिलते ! लेकिन फिर अपने को कोसने लगा कि यदि आज मैं इस परिवार में नहीं होता तो कोई और तो होता ! बस स्टैंड आ चुका  था !

बस आई और चली गई ! हिम्मत ने साथ छोड़ दिया कि या तो ये दस रुपए किराए पर खर्च कर दूँ या फिर शाम को घर जाने के लिए रख लूँ ! फैसला किया कि दिन में चाहे जितना दूर जाना पड़े, पैदल ही चलूँगा और दूसरे दफ्तर के लिए चल दिया !

दिल्ली गेट ! भीड़ भरा इलाका ! कोने पर ही जयप्रकाश नारायण अस्पताल ! गेट पर खड़ी  भीड़ ने ध्यान
खींचा ! पास जाकर देखा तो एक नौजवान स्ट्रेचर पर लेटा था । पास खड़े परिजनों ने बताया कि नौकरी ना मिलने पर जेहर खा लिया था ! उफ्फ ! पेट की भूख को शांत न करने का बहाना न मिला तो खुद को खत्म कर लिया ! जिंदगी की हार ! मौत की जीत ! ना बाबा ना ! मैं तो ऐसा नहीं करूँगा !जिंदगी से लडूंगा ! लडूंगा अपनी जिंदगी से ! भूख से व्याकुल हो कर अगर मैंने ऐसा कदम उठाया तो मेरे परिवार का क्या होगा ! कल्पना मेरे शरीर में सिहरन दौड़ा देने के लिए काफी थी ! मोटर बसों की चिल्ल-पों ने मेरा ध्यान भंग किया । मैं तो नौकरी की तलाश में हूँ । मिलेगी और जरुर मिलेगी का निश्चय कर में आगे चल दिया ।

रामलीला ग्राउंड के सामने से निकल रहा था की बस स्टैंड से एक युवक मुझे धक्का दे सामने से आ रही बस की तरफ लपका ! मैं धक्का खाकर संभलते हुए बस स्टैंड  ही बैठ गया । बराबर में कॉलेज से निकले दो युवक  और युवती ठिठोली करते नज़र आये ! एक फिल्म देखने की जिद्द कर रहा था जबकि दूसरा कनाट प्लेस घूमना चाह रहा था, मुझे उनकी बातों में रस आने लगा । जब दोनों अपनी-अपनी जिद्द से नहीं टले तो फैसला युवती पर छोड़ दिया गया ! युवती का फैसला सुन मैं भी मन ही मन मुस्कुरा उठा ! युवती ने फैसला दिया कि पहले ओडियन पर फिल्म देखी जाए और फिर कनाट प्लेस घूम लिया जाए ! शायद युवती दोनों ही चांस को छोड़ना नहीं चाह रही थी ! फैसला दोनों को मान्य हो गया तो उन्होंने एक ऑटो रिक्शा को रोका और उसमें बैठ गए । मैं ऊपर वाले को ध्यान से देखने लगा और सोंचा कि "कहा दस रुपे को बचने के लिए दस किलोमीटर पैदल " और "कहाँ पांच सों मौज मस्ती करने के लिए .........कम  !"

घड़ी देखी तो तीन बज रहे थे ! अगर ऐसे ही बैठा रहा तो "आज तक " के दफ्तर पहुँचते-पहुँचते छ: बज जाएँगे ! मुझे अपने परिवार का ख्याल आया तो उठ खड़ा हुआ ! नौकरी की आस ने मेरे पैरों मर पंख बांध दिए थे !

अजमेरी गेट ! बड़ा गन्दा इलाका ! कहते हैं की दिल्ली का "रेड लाइट " एरिया भी यहीं कहीं है ! रेड लाइट एरिया तो समझते हैं ना ? अरे ! वही, बदनाम बस्ती ! जिसमें सदियों से चला आ रहा और ना जाने कितनी सदियों तक चलने वाला जिस्म फिरोशी का धंधा ! छी ! छी ! सोंचता हुआ आगे बढ़ गया !

पहाड़ गंज पुल को पार किया ही था कि कुछ ठेला खीचने वाले तम्बाकू बनाने में मशगूल थे । महंगाई बढे या घटे उन्हें तो रेहड़ा ही खीचना है ! तम्बाकू मुंह में दबाये ! जो कमाया, रात को रोटी पर प्याज रख कर खाया और लम्बी तान कर सो गए ! उन बेचारों को क्या पता कि डिग्री क्या होती है, नौकरी पाने के लिए कैसे-कैसे पापड़ बेलने पड़ते है । लेकिन उन्हें देख कर अपने ऊपर भी ग्लानि होने लगी कि चाहे वह अनपढ़ सही, लेकिन अपना कमा-खा तो रहे हैं,म्हणत तो कर रहे हैं, किसी के आगे भीख तो नहीं मांग रहे और एक मैं हूँ कि घर का सहारा बनने की बजाय घर वालों पर अभी तक बोझ बना बैठा हूँ !

तब तक पहाड़ गंज का थाना आ गया था ! गेट पर पान-सिगरेट बेचने वालों की मुद्रा को देख लगा कि शायद रात की रोटी के जुगाड़ की बात सोंच रहा है या किसी कर्ज को उतरने को लेकर सोंच रहा है । बार-बार पैसों को देखने का अंदाज़ तो यही बता रहा था ! तभी दो चार पुलिस वाले अन्दर से निकले । एक पैकेट सिगरेट का लिया, दो चार पैकेट गुटके के और चलते बने ! पान वाले की मुद्रा बता रही थी कि उसे उसके पैसे नहीं मिलेंगे ! वाह ! क्या बात है !

आठ-दस कदम चलते ही सड़क किनारे बनी झुग्गी-झोपड़ी अपनी किस्मत पर रोटी नज़र आई ! बदबू से भरा जीवन-यापन, लेकिन शायद वे भी इस बदबू के आदि हो गए थे, वरना जहाँ से जाते हुए मेरा जी मितला गया, वह वे रहते है, सोंचिये जरा ........!!

चलते-चलते साइकिल मार्किट के कोने पर जा पहुंचा था ! किनारे पर बने भैरों मंदिर से "आज तक " के कार्यालय की दूरी ज्यादा ना थी, पर पैरों के दर्द ने उसे बढ़ा दिया था ! ख़ैर,किसी तरह वहाँ पहुंचा ! कार्यालय के बहार लगी भीढ़ ने हौंसला पस्त कर दिया था क्योंकि वे सब भी नौकरी की आस में वहां खड़े थे । कुछ बायोडाटा देने आये थे तो कुछ इंटरव्यू के नतीजे के इंतज़ार में !

इतनी देर में एक व्यक्ति अन्दर से बहार आया । उसने किसी का नाम पुकारा । इतने चेहरों के बीच एक चेहरा खिला ! कोई भी कह सकता था कि उस व्यक्ति ने इसी को पुकारा था ! भाग कर वह उस व्यक्ति से मिला ! उसने उसको एक लिफाफा दिया और बाकियों को जाने के लिए कह दिया । उत्सुकता जगी और खोजबीन की तो पता चला कि "आज तक" में आज फोटोग्राफर का इंटरव्यू था और जिस व्यक्ति को आज नौकरी मिली थी, वह साल भर से यहाँ चक्कर काट रहा था !

जब में उस व्यक्ति से मिला तो उसने बताया कि वह हर रोज़ यहाँ आकर  बैठ जाता था और उसने कसम खा राखी थी क यदि उसने नौकरी करनी है तो यहीं पर वरना यहीं दरवाजे पर बैठ कर अपनी जान दे देगा । आखिर फोटोग्राफी सीखने के लिए उसने अपने घर का सारा पैसा जो लगा दिया था !

दिल को ठेस लगी और लगा की शायद मुझे भी ये कदम उठाना पड़ेगा और अगर किस्मत ने साथ दिया तो जल्द से जल्द, नहीं तो देर-सवेर नौकरी मिल ही जाएगी और अगर इतने पर भी नहीं मिली तो ......

सर चकरा रहा था ! फाइल गिरने को थी ! यदि दीवार का सहारा ना मिला होता तो .......।।

स्त्री-पुरुष

स्त्री और पुरुष का झगड़ा चल रहा था । स्त्री का कहना था  कि यदि वह नहीं होती तो इस दुनिया में सुन्दरता का कोई मान नहीं होता जब कि पुरुष का कहना था कि यदि वह नहीं होता तो इस दुनिया का आगे बढ़ाना अकेली स्त्री के लिए बड़ा मुश्किल हो जाता । फैसला क्या होता ? स्त्री और पुरुष दोनों ही हार मानने को तैयार नहीं थे । 

बिखरी लटों के बीच से थोड़े-थोड़े कजरारे नैनों ने पुरुष की पत्थर जैसी चौड़ी छाती के बीच वार किया । और लाल गुलाब जैसी पंखुड़ियों के बीच मुस्कान की एक लहर फैलती चली गई । पुरुष का पत्थर जैसा दिल पिघलने लगा । एक-दुसरे की तरफ बढ़ते हुए स्त्री कह रही थी अगर पुरुष नहीं होता तो उसकी सुन्दरता को नापने के लिए कौन आता ? उधर पुरुष कह रहा था यदि स्त्री नहीं होती तो उसका दिल पत्थर से फूल बनाने के लिए कजरारे नैन और गुलाब जैसी पंखुड़ियों के बीच ये मधुर मुस्कान कहाँ से आती ? 

और दोनों इस लड़ाई को छोड़, एक दूसरे की बाँहों में समाने को आतुर, रजाई ओढ़ चुके थे ।  

रविवार, 16 जून 2013

Father's Day Special..!!

                                                       जाएँ  तो जाएँ कहाँ !!
आज की दुनिया में चारों तरफ भागमभाग मची हुई है । जिसे देखो वही पैसा कमाने के लिए रात दिन एक किये हुए है । स्वयं तो पैसा कमा ही रहे है, साथ ही यह भी चाहते है की उनकी पत्नी भी उनके परिवार के लिए पैसा कमाए । इसलिए आज के ज्यादातर युवक काम काजी लड़की को अपनी जीवन-संगिनी बनाना पसंद करते हैं ।

 यदि इन युवकों से पूछा जाये कि ये जो रात-दिन एक करके पैसा कमा रहे हैं, किसके लिए ? तो शायद इनका जवाब होगा अपने लिए, अपने बच्चों के लिए । जो शायद इस सदी का सबसे बड़ा झूठ होगा ।

क्योंकि युवा पीढ़ी जो यह कहती है कि वे अपने बच्चों के लिए पैसा कमा रहे हैं, से पूछे कि पैसा जो वे अपने बच्चो के लिए कमा रहे हैं, वे उससे अपने बच्चों को क्या वे चीज़े दिला पाएंगे, जिसकी उनका बच्चा तमन्ना करता है तो भी शायद वे ये ही जवाब देंगे : "क्यूँ नहीं पैसा है तो दुनिया की हर चीज़ खरीदी जा सकती है ।" परन्तु शायद उन्हें यह नहीं पता कि दुनिया की हर चीज़ तो पैसे से खरीदी जा सकती है, नहीं खरीदा जा सकता तो माँ-बाप का प्यार । जो आज की इस भागमभाग भरी जिंदगी में ख़तम होता जा रहा है ।

जिस प्रकार, कोई भी मकान बिना नीव के खड़ा नहीं हो सकता, उसी प्रकार किसी बच्चे का भविष्य अपने माँ-बाप के प्यार के बिना नहीं संवर सकता । एक मोटे तौर पर अनुमान लगाया जाये तो हफ्ते के सात दिनों में से एक दिन भी हम अपने बच्चे को प्यार नहीं कर पाते । सवेरे जब बच्चा स्कूल जा रहा होता है तो बाप अपने दैनिक कार्यो में लगा होता है और जल्द बजी में अपने बच्चे के लिए माँ या तो डबल रोटी लगा रही होती है या बच्चे को तैयार करने में लगी होती है । बच्चा दोपहर को स्कूल से घर आता है जब की माँ-बाप का ऑफिस से घर आने का वक्त साढ़े पांच-छ: बजे का होता है । बच्चा आपसे कुछ पूछना चाहता है आप उसे अपनी थकान बता कर माँ के पास भेज देते हैं । माँ शाम का खाना बनाने में जुटी है । ऐसे में बच्चा किसके पास जाये । और फिर रात होते ही सोने की तैयारी ी बच्चा सोंचता ही रह जाता है की वह जाये तो किसके पास ? 

बच्चे का मन कोमल फूल के समान होता है । वंश वृद्धि के लिए बच्चो का इस दुनिया में लाना कोई बड़ी बात नहीं, बड़ी बात है उनको सही दिशा दिखाना, उनमें सुसंस्कार उत्पन करना, अच्छे बुरे का ज्ञान कराना, जो केवल उसके माँ-बाप ही करा सकते हैं, कोई और नहीं ।

सुसंस्कृत बनाने अथवा उनमे अच्छे संस्कार जगाने के लिए यह बात बहुत ही जरुरी होती है, कि हम अपना जितना समय घूमने-फिरने, यार दोस्तों की महफ़िल सजाने में बिताते हैं, उतना समय अपने बच्चो की जिज्ञासा को शांत करने में लगायें । 

बच्चों को उद्दंड अथवा शैतान बनाने में भी माँ-बाप उतने ही सहायक होते हैं जितने की बच्चे स्वयं । होता यह है की जब माँ अथवा बाप बच्चे की तरफ ध्यान नहीं देते तब बच्चा अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए कुछ ऐसे क्रिया कलापों का सहारा लेता है, जिससे माँ-बाप का ध्यान उसकी और आकर्षित हो उसे भी परिवार का सदस्य मान कर उसकी भी समस्याओं की तरफ ध्यान दिया जाये । उसे भी वही इज्जत दी जाये जिसका वह हकदार है । पर हो इसका उल्टा जाता है उसके क्रिया कलापों को या तो नजर अंदाज़ कर दिया जाता है अथवा उसे नालायक, निकम्मा आदि विशेषणों से युक्त कर दन्त फटकार क्र भगा दिया जाता है । उसके मन में झाँकने की बजाए, उसके मन की बातों को समझने अथवा उसकी समस्याओं को दूर करने की बजाए हम उससे स्वयं को दूर करते जाते हैं और जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, बच्चो और उनके माँ-बाप के बीच की खाई इतनी चौड़ी हो जाती है कि फिर उनका कमाया हुआ पैसा भी उस खाई को नहीं भर पाता और फिर माँ-बाप सोचने बैठ जाते हैं कि सारी उम्र हमने इतना पैसा कमाया, किसके लिए ? अपने लिए या खाई के उस पार खड़े अपने बच्चों के लिए ।  







शनिवार, 15 जून 2013

चंद सिक्कों के लिए

दिन भर, थक कर ,
रात को, जब सारी दुनिया ,
सोती है, तब मेरा दिन ,
शुरू होता है ।।

ऐसा नहीं कि, मैं सोता नहीं ,
सोता तो जरुर हूँ, लेकिन, 
विचरता हूँ अपनी आत्मा के साथ,
देखता हूँ उन लोगों को, जो, 
दिन भर थक कर, दूसरों की ,
ग़ुलामी कर आये हैं, उन चंद/थोड़े से ,
सिक्कों के लिए, जिनसे वे ,
अपना, अपने परिवार का, पेट,
पालते हैं, और जिन लोगों की ,
वे ग़ुलामी कर चैन की नींद सोये हैं ,
और सुनहरी/रुपहले ख्वाबों में खोये हैं ,
उनकी आखों में नींद कहाँ ?

उनकी नींद त़ो समय ने उड़ा दी ,क्योंकि 
पेट भर कर ही तो ,
आँखों में नींद आती है, और पेट ,
तब भरा करता है, जब उसमें ,
दो रोटी जाती हैं, और शायद यही ,
दो रोटी, उन चंद सिक्के कमाने वालों के ,
नसीब में नहीं ।।      

आकाश...!!

मैं, बचपन में
आकाश बनना चाहता था ,
तब इसका अर्थ ,
मुझ्रे बताते थे, "पिता"
जब मैं बहुत छोटा था,
अब मैं बड़ा हो गया हूँ ,
आकाश का अर्थ भी, अब, बड़प्पन में बदल गया है,
आकाश का अर्थ अब "अवकाश"
में बदल गया है ,
अब मैं आकाश नही बनना चाहता ,
आकाश के इस अर्थ ने मुझे बदल दिया है ,
मुझे अब आकाश नही बनना है ,
मुझे अब "अवकाश" भी नही बनना है ,
अवकाश का अर्थ है छुट्ठी ,
मैं अभी छुट्ठी नहीं लेना चाहता ,
मुझे अभी छुट्ठी नहीं लेनी ,
छुट्ठी बुजुर्गो को मिलती है
मुझे बुजुर्ग नहीं बनना ,
कर्म के इस रणक्षेत्र में ,
छुट्ठी कैसी,
और जब छुट्ठी के अर्थ को ,
मैं समझना नहीं चाहता ,
तो क्यूँ समझू अवकाश के अर्थ को,
किसलिए मैं बनूँ आकाश ।

हम इक्कीसवी सदी में जायेंगे...

हम इक्कीसवी सदी में जायेंगे !! 
ओढ़ कर नफरत की चाद्दर !
पहन कर प्यार का मुखोटा !
अपनों को बरगलाएगे !!
हम इक्कीसवी सदी में जायेंगे !

" मैन पॉवर " छोड़ " मशीन पॉवर " अपनाएंगे !
हम इक्कीसवी सदी में जायेंगे !

आने वाली संतानों को,
" नो बिज़नस " " नो सर्विस " दे जायेंगे !
हम इक्कीसवी सदी में जायेंगे !

इक्कीसवी सदी में होगा क्या , इसकी एक बानगी:
हाड़ मॉस की नहीं होंगी आने वाली संताने ,
रोबोट होंगे , मशीने होंगी और होंगे "क्लोन"
इज्ज़त करेंगी, कहना मानेंगी और काम करेंगी सारा, 
झगड़े खत्म, लड़ाईयाँ ख़त्म !!!