क्षितिज में, दूर कहीं, जहाँ आकाश मिलता है ,
वहीँ पर एक वायुयान शायद कहीं जा रहा है ,
कहीं जा रहा है या शायद कहीं से आ रहा है ,
आ रहा है या जा रहा है, मुझे इससे क्या ,
क्योंकि मैं दुनिया में तनहा हूँ ।
घर लोटते हुए, भरी बस में, जवान बोल रहे हैं
बच्चे चिल्ला रहे हैं, महिलाऐं चुपचाप बैठी हैं ,
पुरुष पसीना सुखा रहे हैं ,
बस में हर स्टॉप पर शोर बढ़ता ही जा रहा है ,
मगर मुझे क्या, क्योंकि इस भरी दुनिया की ,
भरी बस में भी मैं नितान्त तन्हा हूँ ।
बस से उतर कर चलते हुए, चारों तरफ के लोग
मुझे देख रहे हैं, मुझे ही तो देख रहे हैं ,
गली के वे गंदे बच्चे, जो नाक चाटते ,
माथे पर बेतरतीब से बाल फैले, फटे कपड़े पहने
शायद इन महलों के पीछे बनी झोंपड़ियों में रहते हैं
मुझे इन महलों - झोंपड़ियों से क्या ,
क्योंकि मेरी तरह, मेरा यह अधबना कमरा भी
इन महलों और झोंपड़ियों की तरह तन्हा ही तो है !!
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