सोमवार, 17 जून 2013

भूख

भूख योँ तो कई तरह की होती है जैसे शारीरिक भूख, मानसिक भूख इत्यादि, लेकिन सबसे बड़ी भूख होती है पेट की भूख ! यह भूख ऐसी होती है, जो इंसान को सचाई के रास्ते से हटा कर बड़े से बड़ा अपराध करने को मजबूर कर देती है । यह भूख हमारे इस दुनिया में कदम रखते ही शुरू हो जाती है और तब तक रहती है, जब तक हम इस दुनिया से कूच नहीं कर जाते ! इस भूख की सबसे बड़ी मजेदार बात है कि यह समय-समय पर अपना रूप भी बदलती रहती है जैसे दुनिया में कदम रखते ही इस भूख को शांत करने के लिए माँ के दूध की आवश्यकता होती है तो बुढ़ापे में जब दांत नहीं होते, तब दूध दलिया , रोटी की जगह ले लेते हैं क्योंकि तब ही मुंह में दांत नहीं होते !

और हमारा सार जीवन इसी भूख को शांत करने में लगा रहता है ! कोटला फीरोजशाह का हरा भरा बाग़ ! चारों तरह हरियाली और उसी हरियाली के नीचे लेटे कुछ नवयुवक ! थका हारा चेहरा और सिरहाने की जगह वह फाइल, जिसमे इनकी डिग्री, शंसा व प्रशंसा पत्र, के साथ-साथ अन्य कागजात, जो उन्हें नौकरी दिलाने में सहायक हो सकते थे । आज भी वे इस आशा के साथ जगे होंगे कि वे इन कागजात के बल पर कहीं ना कहीं नौकरी पा सकने में सफल हो जायेंगे ! सुभ से ही दफ्तर-दफ्तर घूमते थक गए होंगे और जब सफल न हो पाए तो सुस्ताने के लिए यहाँ चले आये होंगे जैसे में चला आया ! मैं भी कौन सा उनसे अलग था ? मेरी भी आँखों में भी सुबह एक चमक थी कि मैं आज जैसे भी हो सकेगा, नौकरी पा कर रहूँगा ! अपनी डिग्रीयां और चेहरे पर फींकी हँसी के साथ मुंह में छिपे सर-सर के शब्द मेरी भूख की व्यथा को छुपा नहीं पा रहे थे ! तभी तो पांच रुपए के छोले-भठूरे की प्लेट यहाँ चला आया था ! घर से लायी पानी की बोतल से दो घूँट पानी निकाल कर पिया ! यह सोच कर की जिन्दगी की इस लड़ाई में मैं अकेला ही नहीं हूँ, मन को कुछ ढाढस बंधाया और समय बर्बाद ना हो, उठ कर चल दिया ।

बाहर निकल कर जेब में हाथ डाला, दफ्तर-दफ्तर घूमते-घूमते चालीस रुपए खर्च हो चले थे । घर से पचास का नोट माँ के हाथ से लेते हुए बड़ी ही शर्म आ रही थी । माँ भी बेचारी क्या करती, इधर-उधर से बचा-बचा कर जो भी जोड़ती थी मेरे दफ्तर-दफ्तर घूमने की भेंट चढ़ जाता था ! महंगाई के इस ज़माने में पिता जी की तनख्वाह भी तो इतनी ना थी की रोज़-रोज़ मुझे पचास के नोट मिल पाते । आखिर भगवान् को कोसने लगा कि क्यों न मुझे भी अंबानी या मित्तल जैसे परिवार में पैदा किया की आज ये दिन मुझे देखने को तो नहीं मिलते ! लेकिन फिर अपने को कोसने लगा कि यदि आज मैं इस परिवार में नहीं होता तो कोई और तो होता ! बस स्टैंड आ चुका  था !

बस आई और चली गई ! हिम्मत ने साथ छोड़ दिया कि या तो ये दस रुपए किराए पर खर्च कर दूँ या फिर शाम को घर जाने के लिए रख लूँ ! फैसला किया कि दिन में चाहे जितना दूर जाना पड़े, पैदल ही चलूँगा और दूसरे दफ्तर के लिए चल दिया !

दिल्ली गेट ! भीड़ भरा इलाका ! कोने पर ही जयप्रकाश नारायण अस्पताल ! गेट पर खड़ी  भीड़ ने ध्यान
खींचा ! पास जाकर देखा तो एक नौजवान स्ट्रेचर पर लेटा था । पास खड़े परिजनों ने बताया कि नौकरी ना मिलने पर जेहर खा लिया था ! उफ्फ ! पेट की भूख को शांत न करने का बहाना न मिला तो खुद को खत्म कर लिया ! जिंदगी की हार ! मौत की जीत ! ना बाबा ना ! मैं तो ऐसा नहीं करूँगा !जिंदगी से लडूंगा ! लडूंगा अपनी जिंदगी से ! भूख से व्याकुल हो कर अगर मैंने ऐसा कदम उठाया तो मेरे परिवार का क्या होगा ! कल्पना मेरे शरीर में सिहरन दौड़ा देने के लिए काफी थी ! मोटर बसों की चिल्ल-पों ने मेरा ध्यान भंग किया । मैं तो नौकरी की तलाश में हूँ । मिलेगी और जरुर मिलेगी का निश्चय कर में आगे चल दिया ।

रामलीला ग्राउंड के सामने से निकल रहा था की बस स्टैंड से एक युवक मुझे धक्का दे सामने से आ रही बस की तरफ लपका ! मैं धक्का खाकर संभलते हुए बस स्टैंड  ही बैठ गया । बराबर में कॉलेज से निकले दो युवक  और युवती ठिठोली करते नज़र आये ! एक फिल्म देखने की जिद्द कर रहा था जबकि दूसरा कनाट प्लेस घूमना चाह रहा था, मुझे उनकी बातों में रस आने लगा । जब दोनों अपनी-अपनी जिद्द से नहीं टले तो फैसला युवती पर छोड़ दिया गया ! युवती का फैसला सुन मैं भी मन ही मन मुस्कुरा उठा ! युवती ने फैसला दिया कि पहले ओडियन पर फिल्म देखी जाए और फिर कनाट प्लेस घूम लिया जाए ! शायद युवती दोनों ही चांस को छोड़ना नहीं चाह रही थी ! फैसला दोनों को मान्य हो गया तो उन्होंने एक ऑटो रिक्शा को रोका और उसमें बैठ गए । मैं ऊपर वाले को ध्यान से देखने लगा और सोंचा कि "कहा दस रुपे को बचने के लिए दस किलोमीटर पैदल " और "कहाँ पांच सों मौज मस्ती करने के लिए .........कम  !"

घड़ी देखी तो तीन बज रहे थे ! अगर ऐसे ही बैठा रहा तो "आज तक " के दफ्तर पहुँचते-पहुँचते छ: बज जाएँगे ! मुझे अपने परिवार का ख्याल आया तो उठ खड़ा हुआ ! नौकरी की आस ने मेरे पैरों मर पंख बांध दिए थे !

अजमेरी गेट ! बड़ा गन्दा इलाका ! कहते हैं की दिल्ली का "रेड लाइट " एरिया भी यहीं कहीं है ! रेड लाइट एरिया तो समझते हैं ना ? अरे ! वही, बदनाम बस्ती ! जिसमें सदियों से चला आ रहा और ना जाने कितनी सदियों तक चलने वाला जिस्म फिरोशी का धंधा ! छी ! छी ! सोंचता हुआ आगे बढ़ गया !

पहाड़ गंज पुल को पार किया ही था कि कुछ ठेला खीचने वाले तम्बाकू बनाने में मशगूल थे । महंगाई बढे या घटे उन्हें तो रेहड़ा ही खीचना है ! तम्बाकू मुंह में दबाये ! जो कमाया, रात को रोटी पर प्याज रख कर खाया और लम्बी तान कर सो गए ! उन बेचारों को क्या पता कि डिग्री क्या होती है, नौकरी पाने के लिए कैसे-कैसे पापड़ बेलने पड़ते है । लेकिन उन्हें देख कर अपने ऊपर भी ग्लानि होने लगी कि चाहे वह अनपढ़ सही, लेकिन अपना कमा-खा तो रहे हैं,म्हणत तो कर रहे हैं, किसी के आगे भीख तो नहीं मांग रहे और एक मैं हूँ कि घर का सहारा बनने की बजाय घर वालों पर अभी तक बोझ बना बैठा हूँ !

तब तक पहाड़ गंज का थाना आ गया था ! गेट पर पान-सिगरेट बेचने वालों की मुद्रा को देख लगा कि शायद रात की रोटी के जुगाड़ की बात सोंच रहा है या किसी कर्ज को उतरने को लेकर सोंच रहा है । बार-बार पैसों को देखने का अंदाज़ तो यही बता रहा था ! तभी दो चार पुलिस वाले अन्दर से निकले । एक पैकेट सिगरेट का लिया, दो चार पैकेट गुटके के और चलते बने ! पान वाले की मुद्रा बता रही थी कि उसे उसके पैसे नहीं मिलेंगे ! वाह ! क्या बात है !

आठ-दस कदम चलते ही सड़क किनारे बनी झुग्गी-झोपड़ी अपनी किस्मत पर रोटी नज़र आई ! बदबू से भरा जीवन-यापन, लेकिन शायद वे भी इस बदबू के आदि हो गए थे, वरना जहाँ से जाते हुए मेरा जी मितला गया, वह वे रहते है, सोंचिये जरा ........!!

चलते-चलते साइकिल मार्किट के कोने पर जा पहुंचा था ! किनारे पर बने भैरों मंदिर से "आज तक " के कार्यालय की दूरी ज्यादा ना थी, पर पैरों के दर्द ने उसे बढ़ा दिया था ! ख़ैर,किसी तरह वहाँ पहुंचा ! कार्यालय के बहार लगी भीढ़ ने हौंसला पस्त कर दिया था क्योंकि वे सब भी नौकरी की आस में वहां खड़े थे । कुछ बायोडाटा देने आये थे तो कुछ इंटरव्यू के नतीजे के इंतज़ार में !

इतनी देर में एक व्यक्ति अन्दर से बहार आया । उसने किसी का नाम पुकारा । इतने चेहरों के बीच एक चेहरा खिला ! कोई भी कह सकता था कि उस व्यक्ति ने इसी को पुकारा था ! भाग कर वह उस व्यक्ति से मिला ! उसने उसको एक लिफाफा दिया और बाकियों को जाने के लिए कह दिया । उत्सुकता जगी और खोजबीन की तो पता चला कि "आज तक" में आज फोटोग्राफर का इंटरव्यू था और जिस व्यक्ति को आज नौकरी मिली थी, वह साल भर से यहाँ चक्कर काट रहा था !

जब में उस व्यक्ति से मिला तो उसने बताया कि वह हर रोज़ यहाँ आकर  बैठ जाता था और उसने कसम खा राखी थी क यदि उसने नौकरी करनी है तो यहीं पर वरना यहीं दरवाजे पर बैठ कर अपनी जान दे देगा । आखिर फोटोग्राफी सीखने के लिए उसने अपने घर का सारा पैसा जो लगा दिया था !

दिल को ठेस लगी और लगा की शायद मुझे भी ये कदम उठाना पड़ेगा और अगर किस्मत ने साथ दिया तो जल्द से जल्द, नहीं तो देर-सवेर नौकरी मिल ही जाएगी और अगर इतने पर भी नहीं मिली तो ......

सर चकरा रहा था ! फाइल गिरने को थी ! यदि दीवार का सहारा ना मिला होता तो .......।।

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