बुधवार, 26 जून 2013

गुमनाम अँधेरे (PART - 2)

गुमनाम अँधेरे , मेरे ,
चारों ओर बिखरते जा रहे हैं ,
मैं उन अंधेरों से, घबरा कर ,
भागता जा रहा हूँ ।
पता नहीं ,
कहाँ तक भागना होगा ,
क्योंकि अँधेरे में ,
मंजिल भी तो नजर नहीं आती ।
मंजिल की तलाश ,
मेरी तरह, तुम्हें भी तो है ।
पर, तुम, रोशनी में नहा कर ,
अपनी मंजिल तलाश कर रहे हो ,
और मैं, गुमनाम अंधेरों में खोकर ,
और शायद यही तुम में और मुझ में ,
फर्क है कि ,
मैं अपनी मंजिल को तलाशता रह जाऊंगा ,
और तुम, अपनी मंजिल को पा लोगे, क्योंकि ,
तुम रोशनी में अपनी मंजिल तलाश कर रहे हो 
और मैं ,
गुमनाम अंधेरों में खोकर । 

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