मैं ,
आज ,
एक अनदेखी चिता पर ,
जल रहा हूँ ,
अपने ही पापों पर ,
पल रहा हूँ ,
जुआ भी तो ,
एक पाप है ,
सारे जहाँ का ये बाप है ।
बिकवा दे तो
घर के बर्तन
बिकवा दे ,
बनवा दे तो ,
कोठियां ही कोठियां बनवा दे ।
हाँ ,
एक ख्वाहिश थी ,
हो मेरी भी एक कोठी ,
पर पड़ गए ,
जान के लाले ,
नसीब भी न हुई रोटी ,
कोठी की लालसा
मेरी प्रेयसी ने जगाई
जो - न जाने कहाँ से
मेरी जिंदगी में आ समाई ,
आज , जब उसे ,
भूखा - नंगा देखता हूँ ,
तो ,कोसता हूँ ,
उस शख्स को
जिन शख्स ने ,
मुझे ,
ये ,
जुए की लत लगाई !!
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें