बुधवार, 26 जून 2013

जुए का खेल ..!!

मैं ,
आज ,
एक अनदेखी चिता पर ,
जल रहा हूँ ,
अपने ही पापों पर ,
पल रहा हूँ ,
जुआ भी तो ,
एक पाप है ,
सारे जहाँ का ये बाप है ।
बिकवा दे तो 
घर के बर्तन 
बिकवा दे ,
बनवा दे तो ,
कोठियां ही कोठियां बनवा दे ।
हाँ ,
एक ख्वाहिश थी ,
हो मेरी भी एक कोठी ,
पर पड़ गए ,
जान के लाले ,
नसीब भी न हुई रोटी ,
कोठी की लालसा 
मेरी प्रेयसी ने जगाई 
जो - न जाने कहाँ से 
मेरी जिंदगी में आ समाई ,
आज , जब उसे ,
भूखा - नंगा देखता हूँ ,
तो ,कोसता हूँ , 
उस शख्स को 
जिन शख्स ने ,
मुझे ,
ये ,
जुए की लत लगाई !!  

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